प्रीति जब प्रथम-प्रथम जगती है,
दुर्लभ स्वप्न समान रम्य नारी नर को लगती है
कितनी गौरवमयी घड़ी वह भी नारी जीवन की
जब अजेय केसरी भूल सुध-बुध समस्त तन-मन की
पद पर रहता पड़ा, देखता अनिमिष नारी-मुख को,
क्षण-क्षण रोमाकुलित, भोगता गूढ़ अनिर्वच सुख को!
यही लग्न है वह जब नारी, जो चाहे, वह पा ले,
उडुऑ की मेखला, कौमुदी का दुकूल मंगवा ले.
रंगवा ले उंगलियाँ पदों की ऊषा के जावक से
सजवा ले आरती पूर्णिमा के विधु के पावक से.
तपोनिष्ठ नर का संचित ताप और ज्ञान ज्ञानी का,
मानशील का मान, गर्व गर्वीले, अभिमानी का,
सब चढ़ जाते भेंट, सहज ही प्रमदा के चरणों पर
कुछ भी बचा नहीं पाटा नारी से, उद्वेलित नर.
किन्तु, हाय, यह उद्वेलन भी कितना मायामय है !
उठता धधक सहज जिस आतुरता से पुरुष ह्रदय है,
उस आतुरता से न ज्वार आता नारी के मन में
रखा चाहती वह समेटकर सागर को बंधन में.
किन्तु बन्ध को तोड़ ज्वार नारी में जब जगता है
तब तक नर का प्रेम शिथिल, प्रशमित होने लगता है.
पुरुष चूमता हमें, अर्ध-निद्रा में हमको पाकर,
पर, हो जाता विमिख प्रेम के जग में हमें जगाकर.
और जगी रमणी प्राणों में लिए प्रेम की ज्वाला,
पंथ जोहती हुई पिरोती बैठ अश्रु की माला.
-रामधारी सिंह "दिनकर" (उर्वशी से)
बेहतरीन प्रस्तुति
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति
ReplyDeleteयथार्थ सत्य से पूरित उत्तम रचना ।
ReplyDeleteदिनकर की सशक्त रचना।
ReplyDeleteकुणाल जी,सुशील जी और प्रवीण जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्।
ReplyDeleteविवेक जैन
बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeletewww.rimjhim2010.blogspot.com
रामधारी सिंह "दिनकर" की रचना का रसास्वादन कराने के लिए आभार....
ReplyDeleteराम-राम जी,
ReplyDeleteदिनकर जी के साथ आपका भी आभार।
दिनकर जी की ख़ूबसूरत रचना से परिचय कराने के लिये आभार..
ReplyDeleteकिन्तु बन्ध को तोड़ ज्वार नारी में जब जगता है
ReplyDeleteतब तक नर का प्रेम शिथिल प्रशमित होने लगता है
पुरुष चूमता हमें, अर्ध-निद्रा में हमको पाकर,
पर, हो जाता विमिख प्रेम के जग में हमें जगाकर।
दिनकर जी की कविता प्रस्तुत करने के लिए आभार।
दिनकर ji की सशक्त रचना ...
ReplyDeleteyou are doing a good work.
ReplyDeletethank
दिनकर जी की उत्कृष्ट रचना पढवाने का आभार
ReplyDeleteमेरे इस ब्लॉग पर आने और प्रोत्साहन के लिये आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद!
ReplyDeleteविवेक जैन