This blog is dedicated to hindi poetry of old as well as new poets. गीत जब मर जायेंगे तो क्या यहाँ रह जायेगा, एक सिसकता आँसुओं का कारवाँ रह जायेगा....
Pages
▼
Thursday, May 5, 2011
प्रयाण गीत
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!
हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!
सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर डरो नहीं तुम निडर डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!
प्रपात हो कि रात हो संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो चंद्र से बढ़े चलो
वीर, तुम बढ़े चलो धीर, तुम बढ़े चलो।
एक ध्वज लिए हुए एक प्रण किए हुए
मातृ भूमि के लिए पितृ भूमि के लिए
वीर तुम बढ़े चला! धीर तुम बढ़े चलो!
अन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
यत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!
- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
बहुत ही प्रभावित करता है यह गीत।
ReplyDeleteबहुत ही ओजपूर्ण गीत..बचपन में जिस गीत को गाया करते थे,आज फिर याद दिला दिया ...
ReplyDeleteअन्न भूमि में भरा वारि भूमि में भरा
ReplyDeleteयत्न कर निकाल लो रत्न भर निकाल लो
वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो!
विलक्षण गीत...
भाई विवेक जी अपने बचपन की यादें ताजा कर दिया |माहेश्वरी जी की यह कविता हम लोग छोटी कक्षाओं में पढ़ चुके हैं आभार
ReplyDeleteबहुत प्रभावित करता ...ओजपूर्ण गीत ...
ReplyDeleteबचपन में जिस गीत को गाया करते थे,आज फिर याद दिलाने के लिए धन्यवाद|
ReplyDeleteऐसे गीत आज की आवश्यकता है जब कि लोग देशप्रेम के प्रति उदासीन हैं । प्रेरणा देता गीत पढवाने के लिये धन्यवाद।
ReplyDeletegeet ke bol achchhe hai.
ReplyDeleteवाह बहुत ही सुन्दर
ReplyDeleteकक्षा 5 या 4 में पढ़ी थी ये कविता
धन्यवाद
कई साल बाद सामने आया ये गीत।
ReplyDeleteआप सभी का बहुत बहुत आभार!
ReplyDeleteविवेक जैन