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Saturday, May 7, 2011

मुक्ति

कोई एहसान नहीं किया हमने तुम पर !
यह तो तुम्हारा अधिकार था और हमारा कर्तव्य !
पीढियों का ऋण चढा था जो हम पर ,
उतार, दिया तुमने आनन्द और सुख !
आभार तुम्हारा !
आत्मज मेरे !
हमारा अस्तित्व व्याप्त रहेगा ,
जहाँ तक जायेगा तुम्हारा विस्तार !
तुम्हारा विकसता व्यक्तित्व सँवारने में,
चूक गये होंगे कितनी बार
आड़े आ गई होंगी हमारी सीमायें !
पर तुम्हारे लिये खुली हैं आ-क्षितिज दिशायें !
विस्तृत आकाश में उड़ान भरते
कोई द्विविधा मन में सिर न उठाये
कोई आशंका व्याप न जाये !
चलना है बहुत आगे तक ,
समर्थ हो तुम !
शान्त और प्रसन्न मन से
तुम्हें मुक्त कर देना चाहती हूँ अब
और स्वयं को भी -
हर बंधन से, भार से, अपेक्षा और अधिकार से,
कि निश्तिन्त और निर्द्वंद्व रहें हम !
जी सकें सहज जीवन, अपने अपने ढंग से !
क्योंकि प्यार बाँधता नहीं मुक्त करता है
और तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ मैं !
-प्रतिभा सक्सेना

13 comments:

  1. आभार सुन्दर कविता पढ़वाने का, प्रतिभाजी के ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ।

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  2. प्रतिभा जी की एक और खूबसूरत रचना ...आभार

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  3. प्रवीण जी, आपका आभारी हूँ।
    संगीता जी, नहीं पता आपका किन शब्दों में शुक्रिया अदा करुँ।
    विवेक जैन

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  4. mukhar dristikon ,sunder srijan,

    क्योंकि प्यार बाँधता नहीं मुक्त करता है
    और तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ मैं !

    badhayi ji .

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  5. प्रतिभा जी बहुत खूबसूरत रचना. आभार.

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  6. विस्तृत आकाश में उड़ान भरते
    कोई द्विविधा मन में सिर न उठाये
    कोई आशंका व्याप न जाये !
    चलना है बहुत आगे तक ,
    समर्थ हो तुम ! ... bahut hi badhiyaa rachna

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  7. उन अभिभावकों के लिए सीख है जो बच्चों को एक एहसान की तरह पालते हैं ...
    निश्छल प्रेम स्वतंत्र ही करता है , बंधनों में नहीं बांधता...
    बहुत सुन्दर !

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  8. मुक्त कर दिया आपने बच्चों को आ-क्षितिज विस्तार के लिए ...यही मुक्ति बच्चों को घर की तरफ लौटने को मजबूर करती है यानि बाँध लिया आपने यूँ मुक्त करके साधुवाद

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  9. bahut sunder rachanaa,aek siksha deti hui ki pyaar bandhan nahi mukti hai aur ye mukti hi apne aap bandhan main baandh deta hai.
    man ko chunewaali bhaavpoorn rachanaa.

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  10. This comment has been removed by the author.

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