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Sunday, May 15, 2011

हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो

हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा
चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा

चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है
एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा

जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा

हम भी हमेशा क़त्ल हुए अन्द तुम ने भी देखा दूर से लेकिन
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा

ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा
-मजरूह सुल्तानपुरी

11 comments:

  1. जिन खोजा तिन पाइयाँ...बड़ी गहरी पैठ है...

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  2. baut bahut hi accha likah he aapne

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  3. बहुत खूब ... मजरूह जी की बात ही क्या ...

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  4. आप सभी का आभार! और खरे साहब, मैं कविता नहीं लिखता, ये मजरूह जी की रचना है
    विवेक जैन

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  5. vivek ji sunder gazal padhvane ka bahut shukriya
    rachana

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  6. प्रभावकारी लेखन के लिए बधाई।
    कृपया बसंत पर एक दोहा पढ़िए......
    ==============================
    शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
    गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी
    ===================================

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  7. मजरूह सुल्तानपुरी की शानदार ग़ज़ल से रूबरू करवाने के लिए धन्यवाद!

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  8. बहुत सुन्दर, भावपूर्ण और शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने ! बधाई!

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  9. मजरूह जी के कलाम से रूबरू होने का अवसर मिला आपके ब्लॉग पर, बहुत सुंदर. धन्यबाद.

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  10. आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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