खग! उड़ते रहना जीवन भर!
भूल गया है तू अपना पथ,
और नहीं पंखों में भी गति,
किंतु लौटना पीछे पथ पर अरे, मौत से भी है बदतर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!
मत डर प्रलय-झकोरों से तू,
बढ़ आशा-हलकोरों से तू,
क्षण में यह अरि-दल मिट जाएगा तेरे पंखों से पिसकर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!
यदि तू लौट पड़ेगा थक कर,
अंधड़ काल-बवंडर से डर,
प्यार तुझे करने वाले ही देखेंगे तुझको हँस-हँसकर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!
और मिट गया चलते-चलते,
मंज़िल पथ तय करते-करते,
तेरी खाक चढ़ाएगा जग उन्नत भाल और आँखों पर।
खग! उड़ते रहना जीवन भर!
-गोपाल दास नीरज
vivek ji
ReplyDeletebahut bahut sundar .
jivan ko prerit tatha utsaah ko badhane wali behtreen post .khag ki upma dekar aapne insaan ke jivan me hone wali pareshaniyon ka samna karne ka bhaut hi sundar vikalp aur usse jujh kar nirantar aage badhte rahne ki prerana di hai .
bahut behatreen post
badhai
poonam
नीरज जी की सुन्दर प्रेरणास्पद कविता, धन्यवाद.
ReplyDeleteप्रेरणादाई प्रस्तुति
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और मधुर गीत!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
ReplyDeleteमेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!
प्रेरणादायी रचना है श्री नीरज जी की.
ReplyDeleteइस प्रस्तुति के लिए आपका धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
ReplyDeleteमेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है!
कृपया मेरे ब्लॉग पर आयें http://madanaryancom.blogspot.com/
नीरज जी की इतनी सुन्दर रचना से परिचय कराने के लिये आभार..
ReplyDeleteneeraj ji ki rachnayo ke liye aabhar
ReplyDeleteपहली बार आपके ब्लॉग पर आया, ('बारामासा' - अमरनाथ यात्रा पर कमेन्ट के मार्फ़त) एक से एक सुन्दर रचनाएँ देखकर लगता है काफी देर कर दी. क्षमा चाहूंगा. ......... श्रेष्टतम रचनाओं को प्रस्तुत कर आप सच्चे अर्थों में हिंदी साहित्य की सेवा कर रहे हैं. आभार.
ReplyDeletePlease follow.मेरा ब्लॉग है ---- baramasa98.blogspot.com
ReplyDelete- बारामासा की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देकर सदैव अपना सहयोग बनाये रखेंगे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ. ........... शेष फिर.
आप सभी का बहुत बहुत आभार
ReplyDeleteविवेक जैन
सर इसका अर्थ भी बता दीजिये
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