राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
-गोपाल सिंह नेपाली
गोपाल सिंह नेपाली जी का यह जन्मशती वर्ष भी है और ऐसे में ब्लॉग पर उनकी कविता देना सच्ची श्रृद्धांजलि है. आभार.
ReplyDeleteमेरा ब्लॉग है. Please follow - baramasa98.blogspot.com
बहुत अच्छी रचना पढ़वाने का शुक्रिया।
ReplyDeleteउत्तम कविता... । वाकई स्वाधीन कलम की ताकत धनी को भी पराजित कर ही देती है ।
ReplyDeleteकलम की ताकत बारूदो से भी मजबूत होती है !
ReplyDeleteगोपाल सिंह नेपाली जी सच्ची श्रृद्धांजलि
ReplyDeletegopal singh nepali ji kee sundar rachna padhvane ke liye aabhar.
ReplyDeleteशब्द में बल है।
ReplyDeleteबेहद खूबसूरत कविता.
ReplyDeleteतुझ-सा लहरों में बह लेता
ReplyDeleteतो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
bahut sundar prayas hai aapka jo aapne Nepali ji ko yad kiya- prastut kiya
तुझ-सा लहरों में बह लेता
ReplyDeleteतो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
bahut sundar prayas hai aapka jo aapne Nepali ji ko yad kiya- prastut kiya
तुझ-सा लहरों में बह लेता
ReplyDeleteतो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
bahut sundar prayas hai aapka jo aapne Nepali ji ko yad kiya- prastut kiya
एक लाजवाब ... प्रभावी रचना पढ़वाने का शुक्रिया ...
ReplyDeleteएक सुन्दर रचना पढवाने का शुक्रिया..
ReplyDeleteतुझ-सा लहरों में बह लेता
ReplyDeleteतो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है...धन्यवाद...
आप सभी का धन्यवाद
ReplyDelete-विवेक जैन
गोपाल सिंह नेपाली की कलम की धार बहुत तेज़ है. इतनी बढ़िया रचना पढ़वाने के लिए आपका आभार.
ReplyDeleteYou have indeed the most powerful treasure in your hands... Keep posting.
ReplyDeleteVery powerful .Thanks for posting it.
ReplyDeleteतुझ-सा लहरों में बह लेता
ReplyDeleteतो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
गोपाल सिंह नेपाली जी की रचना पढवाने के लिए साभार धन्यवाद्
sasakt lekhan ......... aabhar
ReplyDeleteकाफी अच्छी रचनाओं का संकलन है आपके ब्लॉग पर...
ReplyDeleteमेरा धन है स्वाधीन क़लम...
ReplyDeleteगोपाल सिंह नेपाली जी की रचना पढवाने के लिए साभार धन्यवाद.......
लिखता हूँ तो मेरे आगे
ReplyDeleteसारा ब्रह्मांड विषय-भर है
बेहतरीन रचना..नेपाली जी की रचना पढवाने के लिए साभार