मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!
मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!
मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!
-महादेवी वर्मा
yaha aise mahadevi varma ji ko padhna sukhad laga...bahut khub
ReplyDeleteइस कालजयी रचना को फिर से पढवाने के लिये आभार...
ReplyDeletebachpan mein pada tha punah parbane ke liye dhanyabad
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर रचना और उम्दा प्रस्तुती!
ReplyDeleteमहादेवी वर्मा जी की सुंदर रचना का पुनर्पाठ कराने के लिए आभार विवेक जी॥
ReplyDeleteइस खूबसूरत रचना को फिर से पढवाने का बहुत शुक्रिया.
ReplyDeleteमहादेवी वर्मा जी को नमन!
ReplyDeleteमहादेवी वर्मा मेरी पसंदीदा कवित्रियों में से एक है , उनकी यह रचना प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद .
ReplyDeleteकालजयी रचना है यह।
ReplyDeleteआपकी साहित्य-धर्मिता को प्रणाम!
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प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
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’व्यंग्य’ उस पर्दे को हटाता है जिसके पीछे भ्रष्टाचार आराम फरमा रहा होता है।
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
vivek ji
ReplyDeleteaap ko hriday se badhai deti hun jo aapke blog par aakar in mahan hastiyon se milne ka soubhagy praot hota hai.
isse bhi achhi baat jiko aaj ki yuva pidhi nahi jante vo bhi inke dwara likhe gaye lekhon .rachnao aur atut sahityon se vanchit na rahen.
apne yug ki kal- jai rachnaye v lekhon ko likhne wali mahan kaviyatri ji ko mera shat -shat naman
aur aapko hardik badhai .is sarahniy kary ke liye--
dhanyvaad
poonam
कालेज के दिनों में यह रचना कविता पाठ प्रतियोगिता में किसी को भी एकाध पुरस्कार दिला जाती थी. यह इसकी सशक्तता का प्रमाण है.
ReplyDeleteयाद दिलाने के लिए आपका आभार.
Thanks for making us read this precious creation again.
ReplyDeleteमहादेवी वर्मा जी की रचना पढ़वाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! उनको मेरा शत शत नमन!
ReplyDeleteमहादेवी जी की इस रचना को पढ़वाने के लिये आपका बहुत-बहुत आभार ।
ReplyDeletemahadevi verma is one of the most effective writer... She has written one of the most read pieces of writing.
ReplyDeleteThanks for making us read this !!
पहली बार आपके ब्लॉग पर आया...कालजयी रचनाओं को एक जगह प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद
ReplyDeleteपथ न मलिन करता आना,
ReplyDeleteपद चिह्न न दे जाता जाना,most meaningful.
ye kavita hamesha se hi mere dil ke bahut karib rahi hai
ReplyDeleterachana
महादेवी जी की इस रचना को पढ़वाने के लिये आपका बहुत-बहुत आभार ।
ReplyDeleteइसे कहते हैं...क्लासिक...
ReplyDeleteMahavevi Varma ji ki is behtreen kavita ko padhvaane ke liye dhanyavaad.is kavita ko pahle bhi kai bar padha hai aapke blog par padhne me aur achchi lagi.aapka aabhar.
ReplyDeleteआनंद आ गया अपनी मनपसंद कविता पढकर....
ReplyDeleteवस्तुतः इस ब्लॉग में आकार अच्छा लगा.... आशा है महानतम रचनाकारों के कालजयी रचना संसार में जाने का मार्ग आप यूँ ही प्रशस्त करते रहेंगे....
मेरी हौसला आफजाई करने का बहुत शुक्रिया.... अपनी आमद बनाए रखे....सादर...
Mahadevi jee ki is sunder kawita ko dobara padhwane ke liye aap ka abhar.
ReplyDeleteरचनाको पढवाने के लिए शुक्रिया
ReplyDeleteमेरा पग पग संगीत भरा,
ReplyDeleteश्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!bahut saarthak rachanaa.badhaai aapko.
please visit my blog and feel free to comment.thanks.
छायावादी युगीन कवि सुश्री महादेवी वर्मा की सभी कवितायेँ हिंदी साहित्य की कालजयी उपलब्धि है. और कालजयी साहित्य को नए आधुनिक माध्यम से पाठकों के समक्ष लाने में आपका योगदान वन्दनीय है.... आभार.
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आप सभी का,
ReplyDeleteविवेक जैन