बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!
वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!
-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
अपने श्रेष्ठ पूर्वज से,
ReplyDeleteक्षमा याचना सहित--
बाबा से करूँ ठिठोली आज |
पर आ जाती है थोड़ी लाज ||
बाबा क्या करने जाते थे-
ऐसा तो था नहीं समाज ||
घाट की महिमा है ज्यादा --
दादी पर या अधिक नाज |
बोलो बाबा अब बोलो न --
खोलो बाबा यह बंद राज ||
बहुत सुन्दर कविता, पढ़वाने का आभार।
ReplyDeleteis kavita ko main gaati rahi hun ...shuru ki do panktiyaan mujhe behad pasand hain
ReplyDeleteबाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
bahut sunder kavita. padhaane ke liye aabhari hun.
ReplyDeleteनिराला की सुन्दर रचना पढवाने के लिए धन्यवाद
ReplyDelete-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"जी की सुन्दर कविता, पढ़वाने का आभार।
ReplyDeleteआपका बहुत बहुत शुक्रिया। आपकी मेहनत के कारण ही इतने कालजयी लोगों की रचना पढ़ने को मिलती है।
ReplyDeleteshree suryakant tripathi ji ki vastav me nirali kavita prastut kee hai aapne vivek ji.aabhar.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और सशक्त रचना!
ReplyDeleteनिराला जी को नमन!
महाप्राण निराला जी की सुन्दर रचना से रूबरू करवाने का आभार...
ReplyDeleteपता था यहाँ हर पल कुछ न कुछ नया घटित होता रहता है .कुछ लोग एक पोस्ट तीन तीन दिन लगाए रहतें हैं .यही सोचकर की कुछ शायद और आयें और आयें और आयें ।
ReplyDeleteमहा -प्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -पता नहीं सरोज स्मृति है या कुछ और लेकिन जो भी है बांधती है रोकती है मार्ग को .
निराला जी की यह रचना फिर से याद दिलाने का शुक्रिया आपका ब्लॉग साहित्य यात्रा पर ले कर चल पड़ता है बहुत सुखद है
ReplyDeleteसुन्दर कविता पढवाने के लिए आभार!
ReplyDeleteनिराला जी ने ज़रूर इसे गंगा के किनारे लिखा होगा...ये रचना यू पी बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी थी...
ReplyDeletebahut accha
ReplyDeleteनिराला जी को याद कराने का आभार!
ReplyDeleteआप पुरानी यादो को ताजा कर देते है
ReplyDeleteआपके माध्यम से निराला जी की यह कविता पहली बार पढी |
ReplyDeleteबहुत अच्छी जानकारी है हमारे ब्लोग में भी पधारे
ReplyDelete