उत्तर नहीं हूँ
मैं प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
नये-नये शब्दों में तुमने
जो पूछा है बार-बार
पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
तुमने गढ़ा है मुझे
किन्तु प्रतिमा की तरह स्थापित नहीं किया
या
फूल की तरह
मुझको बहा नहीं दिया
प्रश्न की तरह मुझको रह-रह दोहराया है
नयी-नयी स्थितियों में मुझको तराशा है
सहज बनाया है
गहरा बनाया है
प्रश्न की तरह मुझको
अर्पित कर डाला है
सबके प्रति
दान हूँ तुम्हारा मैं
जिसको तुमने अपनी अंजलि में बाँधा नहीं
दे डाला!
उत्तर नहीं हूँ मैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
-धर्मवीर भारती
भारती जी की एक बहुत अच्छी कविता पढ़वाने के लिये आभार !
ReplyDeletebahut sarahniy prastuti.
ReplyDeleteधर्मवीर भारती जी इस रचना को शेयर करने हेतु बेहद आभार....
ReplyDeleteविवेक जी आप अच्छा कार्य कर रहे हैं... बधाई...
सादर...
धर्मवीर भारती जी की एक बहुत अच्छी कविता पढ़वाने के लिये आभार !
ReplyDeleteप्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
ReplyDeleteधन्य हुआ भारती जी को पढ़कर ||
लुका छिपी का जीवन।
ReplyDeleteधर्मवीर भारती जी को पढ़वाने के लिए आभार!
ReplyDeleteआपकी खोज सराहनीय है...भारती जी की याद एक इलाहाबादी को दिलाने के लिए...धन्यवाद...
ReplyDeleteनये-नये शब्दों में तुमने
ReplyDeleteजो पूछा है बार-बार
पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही! ...bhut sundar .....
धर्मवीर भारती की इस नायाब रचना के लिए आभार.
ReplyDeleteकभी चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की कविताओं को भी मेरे सपने में जगह दें .
bahut hi shaandaar chayan
ReplyDeleteभारती जी रचना पढवाने हेतु धन्यवाद
ReplyDeleteनये-नये शब्दों में तुमने
ReplyDeleteजो पूछा है बार-बार
पर जिस पर सब के सब केवल निरुत्तर हैं
प्रश्न हूँ तुम्हारा ही!
भारती जी की एक उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत करने के लिए आभार, विवेक जी।
सबको पढ़ना अच्छा लगता है. पढवाने के लिए आभार.
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