इस सोते संसार बीच,
जग कर सज कर रजनी बाले!
कहाँ बेचने ले जाती हो,
ये गजरे तारों वाले?
मोल करेगा कौन,
सो रही हैं उत्सुक आँखें सारी।
मत कुम्हलाने दो,
सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी॥
निर्झर के निर्मल जल में,
ये गजरे हिला हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमे तो,
किंचित् विचलित मत होना॥
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
लहरों ही में लहराना।
'लो मेरे तारों के गजरे'
निर्झर-स्वर में यह गाना॥
यदि प्रभात तक कोई आकर,
तुम से हाय! न मोल करे।
तो फूलों पर ओस-रूप में
बिखरा देना सब गजरे॥
- रामकुमार वर्मा
अहा।
ReplyDeletebahut hi pyaari kavita.ati sunder.
ReplyDeleteडॉ .राम कुमार वर्मा के "तारे गजरों वाले ...."लेके कहाँ चली मतवाली रात .क्या चयन है विवेक जी आपका भी एक कविता से बढ़कर एक प्रतिनिधिक रचनाएं रचनाकारों की आप ला रहें हैं /शुक्रिया .
ReplyDeleteसुन्दर भावयुक्त कविता....
ReplyDeletesunder bhav poorn kavita
ReplyDeleteरात्रि का विषद चित्रण स्वर्गीय राम कुमार वर्मा के शब्दों में पढ़ कर मज़ा आ गया...अपने युग के मूर्धन्य साहित्यकारों को पढवाने के लिए धन्यवाद...
ReplyDeleteतुम से हाय! न मोल करे।
ReplyDeleteतो फूलों पर ओस-रूप में
बिखरा देना सब गजरे॥
bahut sundar prastuti.aabhar vivek ji.
रामकुमार वर्मा जी के (यदि मै गलत नहीं हूँ तो) कौमिदी महोत्सव, औरंगजेब की आखिरी रात अदि नाटक इतने गहरे मन में बैठे हुए हैं कि बयां नहीं कर सकता. परन्तु उनकी कवितायेँ भी दिल को छू लेती थी. "...प्रिय तुम भूले मै क्या गाऊँ, जिस ध्वनि में तुम बसे ......" महबूबा फिल्म के "..मेरे नैना सावन भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा......." से ज्यादा मन को भाता था.......
ReplyDeleteइतने वर्षों बाद उनकी कविता आज फिर पढने को मिली तो आपका आभार किस प्रकार व्यक्त करूं.
सही है भाई ||
ReplyDeletevaah vaah मजा आ गया छांट कर मोल लाते हो आप कविताएं
ReplyDeleteपढ़कर बहुत अच्छा लगा!
ReplyDeletenice poem.
ReplyDeletekuchh vilakshan sa hai kavita me...
ReplyDeleteभुत लाजवाब कविता है राम कुमार जी की ...
ReplyDeleteभुत लाजवाब कविता है राम कुमार जी की ...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteहोने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
ReplyDeleteलहरों ही में लहराना।
'लो मेरे तारों के गजरे'
निर्झर-स्वर में यह गाना॥
वह अति सुन्दर..
क्या सुन्दर प्रस्तुती..आनंददायक
शुक्रिया भाई विवेक जी .ऐसी टिप्पणी अकसर लेखन को देह्काती रहतीं हैं .
ReplyDeletenice and heart touching .
ReplyDeleteAsha
सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभ.का.
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत और लाजवाब रचना लिखा है आपने! दिल को छू गयी!
ReplyDeleteसुन्दर भावयुक्त कविता.
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार,
ReplyDeleteविवेक जैन vivj2000.blogspot.com
तुम से हाय! न मोल करे।
ReplyDeleteतो फूलों पर ओस-रूप में
बिखरा देना सब गजरे॥
पहली बार पढ़ी डा. साहब की यह रचना बहुत अच्छी लगी