अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ तागा टुट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिराह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई
मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
-ग़ुलज़ार
anoothi rachana ......gulzar ji aur koi nahi
ReplyDeleteलेकिन उसकी सारी गिराहे
ReplyDeleteसाफ नजर आती हैं
अलबेली प्रस्तुति |
प्रसन्न हुआ मानस ||
आभार |
लाज़वाब नज़्म पढवाने के लिये आभार..
ReplyDeleteमैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
ReplyDeleteलेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
.... gulzaar ji ke baare me kya kahna, bas jawaab nahi
मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
ReplyDeleteलेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
bahut nam hai gulzar ji ka aaj aapne unki shandar prastuti de man harshit kar diya hai vivek ji.thanks.
ek khoobsurat najm guljaar ji ki padhvaane ka shukriya.
ReplyDeletekhoobsoorat nazm padvane ke liye dhanyabad
ReplyDeleteरिश्ते दुनियावी पैवंद नुमा ही होतें हैं अब गठ्बंधनिया सरकार से .बुनकरों की बात दीगर है सरकार में तो बुनकर रहे नहीं .अच्छी रचना गुलज़ार साहब .की .
ReplyDeleteगुलजार साहब का जवाब नहीं।
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गुलजार साहब की एक उम्दा ग़ज़ल प्रस्तुत करने के लिए आपका हार्दिक आभार. वैसे यह ग़ज़ल उनकी ही आवाज में शायद आपने जगजीत सिंह की अल्बम 'मरासिम' में भी सुनी होगी. लेकिन पढ़कर तो और भी आनंद आ गया भाई, पुनः आभार !
ReplyDeleteअच्छा लिखा है।
ReplyDeleteधन्यवाद
बेहतरीन, गुलजार गुलजार रहेंगे।
ReplyDeleteगुलज़ार जी मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार हैं ....आभार
ReplyDeleteआहा.. गुलज़ार साहब! धन्यवाद प्रस्तुति के लिए..
ReplyDeleteपरवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
आभार
मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
ReplyDeleteलेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे...बहुत सुन्दर......गुलजार साहब
मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक है..आभार