लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
-ज़फ़र
वाह।
ReplyDeleteलाज़वाब गज़ल पढवाने के लिये आभार..
ReplyDeleteबहुत बढ़िया गजल |
ReplyDeleteभाई गजल ही है न |
नज्म किसे कहते हैं --
बताना कोई ||
उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
ReplyDeleteदो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
विवेक जी! हेडिंग में 'दायर' हो गया है, सुधार लीजिये बाकी रचना तो निर्विवाद रूप से बेजोड़ है ही...
ReplyDeleteउम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
ReplyDeleteदो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
जफ़र का मातृभूमि के प्रति प्रेम उजागर करता शेर
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
ReplyDeleteकिस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
जफ़र साहब की यह ग़ज़ल बेशक बहुत उम्दा है. आभार आपका.
waah...
ReplyDeleteJafar ji ki sunder ghazal padhvaane ke liye bahut aabhar.
ReplyDeleteजफ़र साहब की बहुत उम्दा ग़ज़ल है..... आभार
ReplyDeleteअस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
ReplyDeleteआप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,
waah waah... aanand aa gaya
ReplyDeleteबहुत सुंदर।
ReplyDelete------
जीवन का सूत्र...
लोग चमत्कारों पर विश्वास क्यों करते हैं?
ज़फर का दर्द बयां करती ग़ज़ल...
ReplyDeleteशहीद और शायर आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र साहब की यह नज्म हबीब पेंटर की आवाज़ में बचपन से सुनते आयें हैं .रफ़ी साहब की आवाज़ में भी सुनी .क्या ज़ज्बा इन लोगों में .दिल की बात कहते थे दिल से .कृपया मुश्किल लफ़्ज़ों के मायने लिख दें विवेक जी .
ReplyDeleteवीरूभाई साहब, आगे से ध्यान रखूंगा और शब्दार्थ भी देने की कोशिश करुंगा, आपके सुझाव का धन्यवाद,
ReplyDeleteविवेक जैन
सुंदर सुंदर कविताएँ पढवा रहा है आपका ये बलॉग । बहादुर शाह जफर की ये गज़ल तो नायाब है ।
ReplyDeleteदिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में ।
कुंजे है कि कूचा-ए है यदि कुंजे है तो इसका अर्थ भी बता दें वैसे ही, लालाज़ार का मतलब भी नही मालूम ।
भाई बहुत ही सुन्दर गजल बधाई जफर साहब को पढ़ना मुझे भी अच्छा लगता है |
ReplyDeleteयह ग़ज़ल सैंकड़ों बार सुनी है परंतु आज भी ताज़ातरीन लगती है.
ReplyDeletevivek ji.....waakayi me shaandaar........one of my fav gazhal..........bahaadur shah jafar saahab ne b kya khub likhi hai........:)
ReplyDeleteregards
naveen solanki
ग़ज़ल के कुछ नए बंद प्रस्तुत करने के लिए आभार !
ReplyDeleteज़फर साहब..क्या खूब लिख गए..!!!! उम्दा..!!!! बेहतरीन..!!!
ReplyDeleteशुक्रिया..ग़ज़ल पढने का मौका मिला..!!!