दीवारों से भी बतियाने की जिद है
हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है
दिये बहुत से गलियारों में जलते हैं
मगर अनिश्चय के आँगन तो खलते हैं
कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
अब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है
जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया
देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है
कौन बहलता है अब परी कथाओं से
सौ विचार आते हैं नयी दिशाओं से
खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है
सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
हमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे
लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है
- यश मालवीय
आप का चयन निश्चित ही बेहतरीन है
ReplyDeleteदीवारों से भी बतियाने की जिद है
ReplyDeleteहर अनुभव को गीत बनाने की जिद है
bahut achchi lagi.....
हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है |
ReplyDeleteहै न --
बस एक सिरा हाथ लगने भर की देर है --
प्रभावशाली अभिव्यक्ति ||
बधाई ||
अद्भुत.... सुन्दर और भावमयी रचना
ReplyDeleteलहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ReplyDeleteऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है
yash malviy ji ki is prabhavshali abhivyakti ko yahan prastut karne ke liye Vivek ji aapka bahut bahut aabhar.
दीवारों से भी बतियाने की जिद है
ReplyDeleteहर अनुभव को गीत बनाने की जिद है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..
zidd hai :)
ReplyDeleteloved it ..
Sometimes zidd is a good thing
बहुत खूब कहा है आपने ।
ReplyDeleteसुन्दर और सार्थक रचना
ReplyDeleteखोया रहता एक परिन्दा सपनों का
ReplyDeleteउसको अपने पास बुलाने की ज़िद है......
behatreen rachna.....
बेहतरीन।
ReplyDeletebahut sundar bhavpurn rachna...
ReplyDeleteयश मालवीय समर्थ गीतकार हैं | आपका चयन सराहनीय है |कवि के कुछ प्रगतिशील गीत भी उपलब्ध करायें |
ReplyDeleteदेख चुके हम भाषा का वैभव सारा
ReplyDeleteबच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है
यश जी की रचनायें बहुत ही प्रेरक होतीं हैं...
saamyik rachna !
ReplyDelete"कौन बहकता है परी कथाओं से
ReplyDeleteसौ विचार आते हैं कई दिशाओं से "
बहुत अच्छा लिखा है| बधाई
आशा
मालवीय जी,
ReplyDeleteआपकी जिद बहुत ही उचित और सार्थक है...बधाई.....!
बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आपने।
ReplyDeleteदेख चुके हम भाषा का वैभव सारा
ReplyDeleteबच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है
सुंदर भावभिव्यक्ति.
बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आपने
ReplyDeleteअच्छी लगी यह रचना..अच्छा चयन.
ReplyDeleteयश मालवीय जी को बधाई.
"सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
ReplyDeleteहमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे
लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है"
बहुत खूब
कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
ReplyDeleteअब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है
जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया...
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब और भावपूर्ण ग़ज़ल !
"खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
ReplyDeleteउसको अपने पास बुलाने की ज़िद है"
jst awesome...
बहुत अच्छी ज़िद है.
ReplyDeleteप्रस्तुति के लिए आभार !