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Saturday, July 16, 2011

गीत बनाने की जिद है

दीवारों से भी बतियाने की जिद है
हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है

दिये बहुत से गलियारों में जलते हैं
मगर अनिश्चय के आँगन तो खलते हैं

कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
अब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है

जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया

देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है

कौन बहलता है अब परी कथाओं से
सौ विचार आते हैं नयी दिशाओं से

खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है

सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
हमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे

लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है
- यश मालवीय

25 comments:

  1. आप का चयन निश्चित ही बेहतरीन है

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  2. दीवारों से भी बतियाने की जिद है
    हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है
    bahut achchi lagi.....

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  3. हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है |

    है न --

    बस एक सिरा हाथ लगने भर की देर है --

    प्रभावशाली अभिव्यक्ति ||
    बधाई ||

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  4. अद्भुत.... सुन्दर और भावमयी रचना

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  5. लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
    ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है
    yash malviy ji ki is prabhavshali abhivyakti ko yahan prastut karne ke liye Vivek ji aapka bahut bahut aabhar.

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  6. दीवारों से भी बतियाने की जिद है
    हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  7. zidd hai :)
    loved it ..
    Sometimes zidd is a good thing

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  8. बहुत खूब कहा है आपने ।

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  9. सुन्दर और सार्थक रचना

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  10. खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
    उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है......
    behatreen rachna.....

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  11. यश मालवीय समर्थ गीतकार हैं | आपका चयन सराहनीय है |कवि के कुछ प्रगतिशील गीत भी उपलब्ध करायें |

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  12. देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
    बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है

    यश जी की रचनायें बहुत ही प्रेरक होतीं हैं...

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  13. "कौन बहकता है परी कथाओं से
    सौ विचार आते हैं कई दिशाओं से "
    बहुत अच्छा लिखा है| बधाई
    आशा

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  14. मालवीय जी,
    आपकी जिद बहुत ही उचित और सार्थक है...बधाई.....!

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  15. बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आपने।

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  16. देख चुके हम भाषा का वैभव सारा
    बच्चों जैसा अब तुतलाने की ज़िद है

    सुंदर भावभिव्यक्ति.

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  17. बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आपने

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  18. अच्छी लगी यह रचना..अच्छा चयन.
    यश मालवीय जी को बधाई.

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  19. "सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
    हमको तो अच्छे लगते हैं मंसूबे

    लहरें अपना नाम-पता तक सब खो दें
    ऐसा इक तूफान उठाने की ज़िद है"

    बहुत खूब

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  20. कितना कुछ घट जाता मन के भीतर ही
    अब सारा कुछ बाहर लाने की ज़िद है
    जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
    चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया...
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब और भावपूर्ण ग़ज़ल !

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  21. "खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
    उसको अपने पास बुलाने की ज़िद है"

    jst awesome...

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  22. बहुत अच्छी ज़िद है.
    प्रस्तुति के लिए आभार !

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