This blog is dedicated to hindi poetry of old as well as new poets. गीत जब मर जायेंगे तो क्या यहाँ रह जायेगा, एक सिसकता आँसुओं का कारवाँ रह जायेगा....
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Thursday, August 11, 2011
अमर स्पर्श
खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!
खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।
क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!
तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!
जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!
तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!
- सुमित्रानंदन पंत ('युगपथ' से)
क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
ReplyDeleteक्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!
pantji ki bahut sunder shabdon main likhi rachanaa ko padhane ke liye aapka bahut bahut shukriyaa,
वाह बहुत ही सुन्दर
ReplyDeleteरचा है आप ने
बहुत ही सुन्दर रचना पढ़वाने के लिये धन्यवाद...
ReplyDeleteपंतजी की रचना पढ़वाने के लिए आपका बहुत -बहुत धन्यवाद ....
ReplyDeleteadbhut rachana....kamal ka shabd sanyojan....sundar
ReplyDeleteसादर आभार इस खुबसूरत गीत को शेयर करने के लिए...
ReplyDeleteसादर...
बहुत सुन्दर, शानदार और भावपूर्ण रचना! आभार!
ReplyDeleteमेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/ण
बहुत खूब . भावपूर्ण रचना
ReplyDeleteसुन्दर रचना पढ़वाने के लिये धन्यवाद.......
ReplyDeleteसुन्दर रचना पढवाने के लिए आभार..
ReplyDeleteबहुत अच्छी प्रस्तुति है!
ReplyDeleteरक्षाबन्धन के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
स्वतन्त्रतादिवस की भी बधाई हो!
Great collection !
ReplyDeleteआभार आपका।
ReplyDeleteपन्त जी की कालजयी रचना ... आभार ...
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