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Monday, September 12, 2011

मेरे प्रिय

मेरे प्रिय...!
मेरे प्रिय का सब ही अभिनंदन करते हैं
मेरे प्रिय को सब ही सुंदर कहते हैं
मैं लज्जा से अरुण, गर्व से भर जाती हूँ
मेरे प्रिय सुंदर शशि से मृदु-मृदु हँसते हैं !

वे जब आते लोग प्रतीक्षा करते रहते हैं
जा चुकने पर कथा उन्हीं की सब कहते हैं
मेरे गृह पर वे प्रवेश पाने की विनती--
बहुत समय तक कर चुपचाप खड़े रहते हैं !

मेरे प्रिय बसंत-से फूलों को लाते हैं
लोग उन्हें लख भौंरों से गुँजन गाते हैं
वे उन सब को भूल कुंज पर मेरे आते
मेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं !

वे जब होते पास न मैं कुछ भी कहती हूँ
वे जब होते पास न मैं उन को लखती हूँ
वे जब जाते चले निराश साँस भर-भर के
उनकी ही आशा से मैं जीवित रहती हूँ !


-चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

11 comments:

  1. मेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    आपको बहुत बहुत बधाई |

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  2. मेरे प्रिय बसंत-से फूलों को लाते हैं
    लोग उन्हें लख भौंरों से गुँजन गाते हैं
    वे उन सब को भूल कुंज पर मेरे आते
    मेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं !

    लालित्यपूर्ण सृजन।

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  3. चन्द्रकुंवर बर्त्वाल जी की मैंने अन्य रचनाय भी पढ़ी है
    बहुत ही सरल भाषा मे अपना ह्र्दय खोल कर भाव विभोर कर देते हैं. बहुत सुन्दर....धन्यवाद...

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  4. बहुत खुबसूरत रचना .....

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  5. क्या लिखा है ... बहुत ही असुंदर.....दिल को छू गया...

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  6. आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
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  7. आस का विश्वास बना रहे।

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  8. क्या बात है...बहुत खूब...

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