मेरे प्रिय...!
मेरे प्रिय का सब ही अभिनंदन करते हैं
मेरे प्रिय को सब ही सुंदर कहते हैं
मैं लज्जा से अरुण, गर्व से भर जाती हूँ
मेरे प्रिय सुंदर शशि से मृदु-मृदु हँसते हैं !
वे जब आते लोग प्रतीक्षा करते रहते हैं
जा चुकने पर कथा उन्हीं की सब कहते हैं
मेरे गृह पर वे प्रवेश पाने की विनती--
बहुत समय तक कर चुपचाप खड़े रहते हैं !
मेरे प्रिय बसंत-से फूलों को लाते हैं
लोग उन्हें लख भौंरों से गुँजन गाते हैं
वे उन सब को भूल कुंज पर मेरे आते
मेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं !
वे जब होते पास न मैं कुछ भी कहती हूँ
वे जब होते पास न मैं उन को लखती हूँ
वे जब जाते चले निराश साँस भर-भर के
उनकी ही आशा से मैं जीवित रहती हूँ !
-चन्द्रकुंवर बर्त्वाल
ठीक ही है।
ReplyDeleteमेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं
ReplyDeleteबहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
आपको बहुत बहुत बधाई |
मेरे प्रिय बसंत-से फूलों को लाते हैं
ReplyDeleteलोग उन्हें लख भौंरों से गुँजन गाते हैं
वे उन सब को भूल कुंज पर मेरे आते
मेरे फूल न लेने पर प्रिय अकुलाते हैं !
लालित्यपूर्ण सृजन।
bahut sundar bhaavavyakti.
ReplyDeleteचन्द्रकुंवर बर्त्वाल जी की मैंने अन्य रचनाय भी पढ़ी है
ReplyDeleteबहुत ही सरल भाषा मे अपना ह्र्दय खोल कर भाव विभोर कर देते हैं. बहुत सुन्दर....धन्यवाद...
बहुत खुबसूरत रचना .....
ReplyDeleteसुन्दर!
ReplyDeleteक्या लिखा है ... बहुत ही असुंदर.....दिल को छू गया...
ReplyDeleteआपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
ReplyDeleteआप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए...
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आस का विश्वास बना रहे।
ReplyDeleteक्या बात है...बहुत खूब...
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