अगर प्यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है फिर क्यों है यह प्यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूंकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है,हमारा भी
रक्त में जलती ईच्छाओं और आंखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्कर क्योंकर ?
दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है;
वसंत की मीठी हवाएं उसके लिए हैं;
फूल, पंक्षियों का कलरव सबकुछ
उसके लिए है
पर प्यार आता है
अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता
फिर भी न जाने क्यों हमें
अस्तित्व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
Kya khaayal hai! Bahut Khoob!
ReplyDeleteसुन्दर भावानुवाद।
ReplyDeleteबहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
ReplyDeleteवाह ..टैगोरजी की रचना पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार
ReplyDeleteरवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना की बहुत अच्छी प्रस्तुति ।
ReplyDeleteबहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
ReplyDeleteप्रेम का गहरा विश्लेषण करती रविन्द्रनाथ ठाकुर की ये कालजयी रचना बेमिसाल है ... शुक्रिया बहुत बहुत ...
ReplyDeleteबेजोड़! रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नमन!
ReplyDeleteफिर भी न जाने क्यों हमें
ReplyDeleteअस्तित्व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है