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Tuesday, October 18, 2011

उदास न हो

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

कदम कदम पे चट्टानें खड़ी रहें, लेकिन
जो चल निकलते हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते।
हवाएँ कितना भी टकराएँ आंधियाँ बनकर,
मगर घटाओं के परछम कभी नहीं झुकते।
मेरे नदीम मेरे हमसफर .....

हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं, मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है।
हज़ारों चांद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फिज़ाओं पे मुस्कुराती है।
मेरे नदीम मेरे हमसफर ....

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

- साहिर लुधियानवी

8 comments:

  1. प्रेरणादायक सुन्दर रचना..

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  2. जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
    वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
    जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
    वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।

    उत्साहवर्द्धक…

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  3. इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. अच्छी प्रस्तुति. बधाई.

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  5. सच है, उदास क्यों होना।

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  6. जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
    वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते...
    बिलकुल सही कहा है..प्रेरक रचना...

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  7. कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

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