बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
पेड़ खड़े फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधूली! साथ नहीं हो तुम
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में
चहचह चहचह मीड़-मीड़ में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
जागी-जागी सोई-सोई
पास पड़ी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमड़ी धारा, जैसी मुझपर -
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँखमिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,
बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।
-शिवमंगल सिंह 'सुमन'
अनुपम साहित्यिक सौन्दर्य।
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति ।
ReplyDeleteकल 16/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है।
धन्यवाद!
बहुत अच्छी प्रस्तुति !
ReplyDeleteबहत सुन्दर प्रस्तुति...
ReplyDeleteअनमोल साहित्य सृजन..
ReplyDeleteलाजवाब ... एक से बड के एक सुन्दर रचनाओं का संकलन है आपका ब्लॉग ... धन्यवाद ...
ReplyDeleteसुमनजी की रचनाएँ मुझे काफी पसंद हैं ..आभार
ReplyDeleteसुंदर प्रस्तुति!
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर भाव...शाम को निहारने का मौका भी तब मिलता है...जब साथ नहीं हो तुम...
ReplyDeleteसुन्दर गीत...
ReplyDeleteसादर आभार...
बहुत सुन्दर.
ReplyDeleteपढकर आनंद आ गया है.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
बहुत ही सुन्दर भावो से भरपूर्ण रचना.....
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति .. शिवमंगल सिंह सुमन के गीत हमेशा ही प्रेरित करते हैं
ReplyDeleteबहुत खूब सर!
ReplyDeleteसादर
खूबसूरत सा एहसास है
ReplyDeleteपर तुम साथ नहीं.....!!
anupam.....
ReplyDeleteआपका संग्रह कल के लिए कल की धरोहर है. आपका आभार.
ReplyDeleteprtyek pankti par wah wah
ReplyDeleteati sundar rachana.....
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