यों ही कुछ
मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गाँठ लगा दी!
था पथ पर मैं
भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन
लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
कभी-कभी
यों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
जड़ता है
जीवन की पीड़ा
निष् तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने
अनजाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
-त्रिलोचन
कभी-कभी
ReplyDeleteयों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
waah...
बहुत सुन्दर ||
ReplyDeleteदो सप्ताह के प्रवास के बाद
संयत हो पाया हूँ ||
बधाई ||
वाह ...बहुत खूब लिखा है ।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ...
ReplyDeleteवाह बहुत खूब लिखा है आपने बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आभार ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।
ReplyDeleteसम्बन्ध को शब्दों में बाँध पाना कठिन है।
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर रचना है त्रिलोचन जी की ...
ReplyDeleteकभी-कभी
ReplyDeleteयों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
Behad sundar panktiyan!
जड़ता है
ReplyDeleteजीवन की पीड़ा
निष् तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने
अनजाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
जीवन में यदि ऐसा परिचय हो तो क्या कहना...!!