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Monday, November 21, 2011

अमर स्पर्श



खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!

खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएँ अमिट हुईं सब लय।

क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!

तन में आएँ शैशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के व्रण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!

जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!

तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!

('युगपथ' से)

- सुमित्रानंदन पंत

7 comments:

  1. तुम सुंदर से बन अति सुंदर
    आओ अंतर में अंतरतर,
    तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
    वरदान, पराजय हो निश्चय!

    बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  2. बहुत सुन्दर गीत पढवाने के लिए सादर आभार....

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  3. तन में आएँ शैशव यौवन
    मन में हों विरह मिलन के व्रण,
    युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
    उर रहे प्रीति में चिर तन्मय
    bahut umdaa prastuti abhaar........ samay mile kabhi to aaiyega meri post par aapka svagat hai

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  4. पंतजी की तो हर -एक रचना निराली ही है

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  5. जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
    वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
    हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
    जग से परिचय, तुमसे परिणय!

    पंक्ति-पंक्ति में भाव ही भाव...

    तन में आएँ शैशव यौवन
    मन में हों विरह मिलन के व्रण,
    युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
    उर रहे प्रीति में चिर तन्मय

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