सरसों के रंग-सा
महुए की गंध-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
होठों पर आने दो
रुके हुए बोल
रंगों में बसने दो
याद के हिंदोल
अलकों में झरने दो
गहराती शाम
झील में पिघलने दो
प्यार के पैगाम
अपनों के संग-सा
बहती उमंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का।
मलयानिल झोंकों में
डूबते दलान
केसरिया होने दो
बाँह के सिवान
अंगों में खिलने दो
टेसू के फूल
साँसों तक बहने दो
रेशमी दुकूल
तितली के रंग-सा
उड़ती पतंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का। -पूर्णिमा वर्मन
अपनों के संग-सा
ReplyDeleteबहती उमंग-सा
एक गीत और कहो
मौसमी वसंत का ...
पूर्णिमा जी का ये मधुर गीत ... प्राकृति की महक लिए ... भीनी भीनी प्रेम की फुहार से भीगा हुवा ... लाजवाब गीत ...
बेहतरीन गीत।
ReplyDeleteनासवा जी और प्रवीणजी,आप का बहुत-बहुतधन्यवाद निरंतर मेरे ब्लोग पर आने के लिये।
ReplyDeleteयाद के हिंदोल
ReplyDeleteअलकों में झरने दो
गहराती शाम
झील में पिघलने दो
....
BAHUT KHOOB.
बहुत ही सुन्दर गीत !
ReplyDeletebahut khoob..likhte rahiye
ReplyDeleteबहुत ही शानदार गीत
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