झूठ आज से नहीं
अनन्त काल से
रथ पर सवार है
और सच चल रहा है
पाँव-पाँव
नदी पहाड़ काँटे और फूल
और धूल
और ऊबड़-खाबड़ रास्ते
सब सच ने जाने हैं
झूठ तो
समान एक आसमान में उड़ता है
और उतर जाता है
जहाँ चाहता है
क्रमश: बदली है
झूठ ने सवारियाँ
आज तो वह सुपरसॉनिक पर है
और सच आज भी
पाँव-पाँव चल रहा है
इतना ही हो सकता है किसी-दिन
कि देखें हम
सच सुस्ता रहा है
थोड़ी देर छाँव में
और
सुपरसॉनिक किसी झँझट में पड़कर
जल रहा है
-भवानी प्रसाद मिश्र
आज भी रचना यथार्थ के करीब और समसामयिक है..इतनी उत्कृष्ट रचना पढवाने के लिये धन्यवाद.
ReplyDeleteरचना यथार्थ को बहुत ही नजदीक से दिखाती हुई प्रतीक होती है.. सार्थक लेखन के लिए बधाई...
ReplyDeleteआज ही सत्य है।
ReplyDeleteआप सब का बहुत-बहुत आभार-
ReplyDeleteविवेक जैन
आज भी रचना यथार्थ के करीब और समसामयिक है|
ReplyDeleteधन्यवाद|