आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गजरता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किंतुं कंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए हैं आदि अंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
गलबाँहें हों या हो कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग-जाग
बतला अपने अनुभव अनंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
हल्दीघाटी के शिला खंड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड
दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छंद नहीं
है कलम बँधी स्वच्छंद नहीं
फिर हमें बताए कौन? हंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
-सुभद्रा कुमारी चौहान
कालजयी रचनायें पढवाने के लिए धन्यवाद...
ReplyDeleteye kavitaa abhi bhi rom rom mein jhankaar jaga deti hai
ReplyDeleteविवेक जी बरबस ही आप हमें इन चिर कुमार और कुमारियों को सुनवा कर बचपन में ले चलें हैं -
ReplyDeleteलक्ष्मी थी या दुर्गा थी ,वह स्वयं वीरता की अवतार ,
देख मराठे पुलकित होते ,उसकी तलवारों के वार ,
महाराष्ट्र कुल देवी भी उसकीआराध्य भवानी थी ,
बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी .
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ।
कृपया रचना वीरों का कैसा हो वसंत में "गज़रना "शब्द ठीक करलें (गरजना ).शुक्रिया रचना पढवाने के लिए .
Shubhdra kumaari ji ki yeh kaaljayee rachna hai.punrsmaran karaya aap ne .abhaar.
ReplyDeleteसुभद्रा जी की यह रचना सर्वदा प्रभावित करती रही है
ReplyDeleteबचपन की पढि हुई रचना याद दिला दी.सर्वकालीन उत्तम !
ReplyDeleteकह दे अतीत अब मौन त्याग
ReplyDeleteलंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग-जाग
बतला अपने अनुभव अनंत-
वीरों का कैसा हो वसंत
बहुत दिनो बाद सुभद्रा कुमारी जी को पढा है। सुन्दर सार्थक प्रस्तुति। धन्यवाद।
ढूंढ़ ढूंढ़ कर पढ़ाते रहिये |
ReplyDeleteमजेदार
बारम्बार
पढ़ कर आनंद आगया
आभार
कालजयी रचनायें पढवाने के लिए धन्यवाद..
ReplyDeleteइस उत्तम रचना को प्रस्तुत करने के लिए आभार।
ReplyDeleteदेश भक्ति की भावना से ओतप्रेत बचपन में पढी थी यह रचना तो फिर याद ताजा हो गयी. वैसे सुभद्रा कुमार चौहान अपनी अत्यधिक लोकप्रिय रचना थी " ........खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ....." इस सार्थक व रचनात्मक पोस्ट के लिए आपका आभार विवेक जी.
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर लगता है यह गीत।
ReplyDeleteओजस्वी रचना ... इन वीर रस की कविताओं ने बचपन याद करा दिया ...
ReplyDeleteयाद हो आया यह गीत. आभार आपका.
ReplyDeleteआपकी पोस्ट रचना अच्छी लगी।
ReplyDelete--
पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
subhadra ji ki yah rachna mujhe behad pasand hai...
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर गीत वीर रस से सरावोर. पढवाने के लिए धन्यबाद.
ReplyDeleteऐसी अमूल्य धरोहर को सहेज कर रखने
ReplyDeleteऔर हम सब तक पहुंचाने के लिए
आभार स्वीकारें .
सुभद्रा जी की रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा! आभार!
ReplyDeleteभूषण अथवा कवि चंद नहीं
ReplyDeleteबिजली भर दे वह छंद नहीं
है कलम बँधी स्वच्छंद नहीं
फिर हमें बताए कौन? हंत-
वीरों का कैसा हो बसंत
सुभद्रा कुमारी चौहान की एक अन्य काल जयी रचना !
आभार !
सुभद्रा कुमारी चौहान जी को मेरा नमन....
ReplyDeleteइस उत्तम रचना की बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
In mahaan kavio ki rachnaye padh ke mann parsann ho gaya..bahut bahut saadhuwaad..in rachnao ko blog pe daalne ke liye...regards era
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