जो अगणित लघु दीप हमारे
तुफानों में एक किनारे
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल
पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल
- रामधारी सिंह दिनकर
ललकारती, कलमों को।
ReplyDeleteकलम, आज उनकी जय बोल
ReplyDelete@
कलम मौन रहती है मेरी.
उसके पद पर आ बैठे हैं
की-बोर्ड के अंगुलि-चेरी.
राष्ट्र कवि की कविता का तो हर कोई दीवाना है भाई, धन्यवाद आपको
ReplyDeleteदिनकर जी अपनी बात बहुत सशक्त तरीके से कहते थे...
ReplyDeleteराष्ट्रकवि की साधारण शब्दों में एक सुन्दर कविता.
ReplyDeleteसार्थक व रचनात्मक पोस्ट के लिए आभार.
इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
ReplyDeleteयदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!
द्निनकर जी को सादर नमन.....
ReplyDeleteबहुत सुन्दर ||
ReplyDeleteबधाई ||
nice work by dinkar !
ReplyDeleteकलम, आज उनकी जय बोल
ReplyDeleteललकार भरी जोश पूर्ण रचना -
ReplyDeleteकुरुक्षेत्र की फिर याद आई .
दिनकर जी मेरे पसंदीदा कवियों मैं से एक हैं उनकी रचना पढ़वाने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद
ReplyDeletekaisa ittifak hai na ki aapki post aur meri post ka sheershak ek sa hai aur vo bhi ek hi din post kiya jana.
ReplyDeleteprabhahi abhivyakti.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी का बहुत बहुत आभारी हूँ, साथ ही आप का भी बहुत बहुत धन्यवाद,
ReplyDeleteविवेक जैन