लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं
साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।
लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
दयाल साहब की
ReplyDeleteसुन्दर प्रेरक कृति ||
साक्षी हों राह रोके खड़े
ReplyDeleteपीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
bahut sunder prastuti.badhaai aapko.
please visit my blog.thanks.
लीक पर न चल कर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करने की प्रेरणा देती इस सुंदर रचना को प्रस्तुत करने के लिए आभार !
ReplyDeleteसाक्षी हों राह रोके खड़े
ReplyDeleteपीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं ...मन भावन प्रस्तुति...
क्या आप इस कोबिता कि सारांश बताइये गा।
Deleteआभार पढ़वाने का.
ReplyDeleteसक्सेनाजी की रचना पढ़वाने के लिए आभार
ReplyDeleteलीक पर वें चलें जिनके
ReplyDeleteचरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
सक्सेना jee ki behad sundar rachna....
bahut bahut dhanywad....
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
ReplyDeleteगर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
prakit ko sajiv banakar badi hi khubsurti se bayan kiya..dil se kah raha hooon bahu acchi rachna hai..tad ke ped to roj dekhta hoon per itni khusurti se aisa na socha tha
बचपन में पढ़ी सर्वेश्वर जी की इस कविता को ताज़ा करने लिए दिल से धन्यवाद विवेक जी.....
ReplyDeleteaapse bida lete lete hi rukna pad gaya..aapne to meri sochi hui koi murad hi puri kar di...itna badhiya collection kiya hai..ek se badhkar ek ustad ki rachnayein..punah dil se hardik dhanyawad
ReplyDeleteआभार!
ReplyDeleteअनिर्मित पंथ हमें भी प्यारे हैं।
ReplyDelete""....हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ReplyDeleteऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं.....""
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक सुन्दर रचना. आभार !
विवेक जी, अगर आप अन्यथा न लें तो कहूँगा कि स्वर्ग सिधार चुके कवि अपनी रचनाओं को नेट पर देखकर निश्चित रूप से आप पर फूलों की वर्षा अवश्य करते होंगे, बिल्कुल उसी अंदाज में जैसे हमारे धार्मिक फिल्मों और टीवी सीरियलों में होती है.
लीक पर वें चलें जिनके
ReplyDeleteचरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
...बहुत सुन्दर और प्रेरक प्रस्तुति...पढवाने के लिये आभार
लीक से हटकर कार्य करने वाले ही इस जगत को कुछ नया दे पाते हैं .बहुत सार्थक कविता प्रस्तुत की है आपने सर्वेश्वर जी की .आभार
ReplyDeleteप्रगतिवादी कवि की निशानी है...अपनी ताकत पर भरोसा...
ReplyDeleteThanks for visiting :)
ReplyDeleteशुक्रिया इतनी सुंदर कविता से रूबरू होने का मौका मिला..!!!
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार आपका हौसला बढ़ाने के लिये,
ReplyDelete-विवेक जैन
nice poem
ReplyDeleteलीक पर वे चलें जिनके
ReplyDeleteचरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं
साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
आपके ब्लॉग के लिये शुभकामनाएं
kya bat hain
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना। सचमुच क्रिएटिव लोग लीक पर नहीं चलते।
ReplyDelete------
बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्तुति।
अब आप अल्पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
ReplyDeleteशुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह सुन्दर रचना पहले भी पढ़ चुकी हूं...आपके सौजन्य से पुनः पढ़ ने का अवसर मिला...आभार.
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