बिखर गये हैं जिन्दगी के तार-तार
रुद्ध-द्वार, बद्ध हैं चरण
खुल नहीं रहे नयन
क्योंकि कर रहा है व्यंग्य
बार-बार देखकर गगन !
भंग राग-लय सभी
बुझ रही है जिन्दगी की आग भी
आ रहा है दौड़ता हुआ
अपार अंधकार
आज तो बरस रहा है विश्व में
धुआँ, धुआँ !
शक्ति लौह के समान ले
प्रहार सह सकेगा जो
जी सकेगा वह
समाज वह —
एकता की शृंखला में बद्ध
स्नेह-प्यार-भाव से हरा-भरा
लड़ सकेगा आँधियों से जूझ !
नवीन ज्योति की मशाल
आज तो गली-गली में जल रही
अंधकार छिन्न हो रहा
अधीर-त्रस्त विश्व को उबारने
अभ्रांत गूँजता अमोघ स्वर
सरोष उठ रहा है बिम्ब-सा
मनुष्य का सशक्त सर !
- महेन्द्र भटनागर
भंग राग-लय सभी
ReplyDeleteबुझ रही है जिन्दगी की आग भी
आ रहा है दौड़ता हुआ
अपार अंधकार
आज तो बरस रहा है विश्व में
धुआँ, धुआँ !
आभार कि महेंद्र जी एक सशक्त कविता पढ़ी.
महेन्द्र भटनागर जी की प्रेणात्मक जोश भरी रचना ने हृदय मे नव ज्योति का मशाल जला दिया...सुन्दर कविता पढ़्वाने के लिये ....धन्यवाद...
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत कविता! पढ़कर बहुत अच्छा लगा!
ReplyDeleteYou are welcome at my new post-
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बहुत सुन्दर ||
ReplyDeleteबधाई ||
अत्यंत सशक्त एवम जोशीली रचना पढवाने के लिये आभार.
ReplyDeleteरामराम.
Mahendra ji ki kavita bahut sashakt aur prerna dayak hai.
ReplyDeleteशक्ति लौह के समान ले
ReplyDeleteप्रहार सह सकेगा जो
जी सकेगा वह
बहुत ओज़स्वी रचना है ... शुक्रिया पढवाने के लिए ..
इतनी सशक्त रचना पढ़ने का अवसर देने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteओज और जोश से परिपूर्ण इस कविता को पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा।
ReplyDeleteआभार आपका इस प्रस्तुति के लिए।
sudar rachna se rubaru karane ke liye shukriya.....
ReplyDeletesudar rachna se rubaru karane ke liye shukriya.....
ReplyDeleteरुद्ध-द्वार, बद्ध हैं चरण
ReplyDeleteखुल नहीं रहे नयन
क्योंकि कर रहा है व्यंग्य
बार-बार देखकर गगन !
महेंद्र भटनागर की यह रचना हमें उस काल खंड में ले जाती हुयी सी प्रतीत होती है जब भारत परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और हर भारतीय क्रंदन कर रहा था. उस युग में निराला, प्रसाद, प्रेमचंद, महादेवि वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखन लाल चतुर्वेदी आदि कवि/लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से जन जागरण की अलख जलाये थे....
विवेक जी, छायावादी कविता के साथ आधुनिक कविताओं पर भी दया दृष्टि बनाये रखें. आभार!
शब्द का प्रवाह है,
ReplyDeleteछन्द सतत राह है।
सुबीर जी,
ReplyDeleteआधुनिक व छायावादी कविताओं के अतिरिक्त मैं तो अपनी ब्लॉग पर गज़लों को भी प्रस्तुत करता रहता हूँ, आगे से अधिक आधुनिक कवितायें प्रस्तुत करने का प्रयत्न करुंगा,
आपके सुझाव का बहुत बहुत धन्यवाद,
विवेक जैन
नवीन ज्योति की मशाल
ReplyDeleteआज तो गली-गली में जल रही
अंधकार छिन्न हो रहा
अधीर-त्रस्त विश्व को उबारने
अभ्रांत गूँजता अमोघ स्वर
सरोष उठ रहा है बिम्ब-सा
मनुष्य का सशक्त सर !....
सशक्त प्रेरणा
Beautiful collection . Thanks for sharing with us.
ReplyDeleteऊर्जा से लबालब..!!!
ReplyDeleteआओ और जीवन उमंग को प्रेरित करती रचना .
ReplyDeletesakaratmak soch ka prateek hai ye rachana..
ReplyDeleteAabhar
सहयोग के लिये सभी का बहुत बहुत आभार,
ReplyDelete-विवेक जैन