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Wednesday, November 9, 2011

शक्ति और क्षमा

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

-रामधारी सिंह "दिनकर"

5 comments:

  1. क्षमा शोभती उस भुजंग को
    जिसके पास गरल हो

    सच है..

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  2. क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
    उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो ।
    स्वायत्त उत्तराखण्ड की मांग बीसवीं सदी के आरम्भ से ही रही. नौवें दशक में जन समूह सड़कों पर उतर आया. राज्य व केंद्र सरकार ने बहुत जनता का तरह तरह से उत्पीडन किया. तब मन में निराशा के भाव आते थे और लगता था कि राष्ट्रकवि की ये पंक्तियाँ सन्देश देती है कि उत्तराखण्ड वासियों को कुछ ऐसा करना चाहिए कि सरकार झुके और स्वायत्त राज्य की घोषणा कर दे. हताशा के क्षणों में मै मित्रों के बीच ये पंक्तियाँ अवश्य दोहराता था.
    आज वर्षों बाद पुनः इन पंक्तियों को स्मरण करवाने के लिए बहुत बहुत आभार.

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