Wednesday, March 30, 2011

मिटने का अधिकार

वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना



वे सूने से नयन,नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती



वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नहीं
जिसने देखी जाने की राह


ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!


क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार!



-महादेवी वर्मा

6 comments:

VIJUY RONJAN said...

maja aa gaya.padh kar.Acche sankalan ke liye badhayee.

हरकीरत ' हीर' said...

ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद!


क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार!

इन पक्तियों की तो न जाने कितनी बार व्याख्या कर चुकी हूँ ......

शिखा कौशिक said...

ऎसा तेरा लोक, वेदना
नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद
Vivek ji bahut sundar bhavabhivyakti prastut ki hai .maine aapke blog ka ullekh ''ye blog achchha laga par kiya hai .aap ''http://yeblogachchhalaga.blogspot.com''par aayen aur apne vicharon se hamara utsahvardhan karen .

Vivek Jain said...

Thanks to all for visiting my blog........

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव! अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार!

बड़ी सुन्दर पंक्तियाँ लगती हैं ये।

Vivek Jain said...

Thanks to all friends!