Saturday, December 29, 2012

चलो अकेले रे!

गर पुकार सुन कोई न आए
तब भी चलो अकेले रे
चलो अकेले! चलो अकेले! चलो अकेले
चलो अकेले रे


गर कोई भी करे न बातें
सुन ओ अरे अभागे
गर सब तुमसे मुख फेरे
हों कायर, भय जागे
लगा प्राण की बाजी तब तू
मुखर बनो, अपनी मन-कथा
कहो अकेले रे


यदि सारे फिर जाएँ तुमसे
सुन ओ अरे अभागे
जाते समय सघन पथ तुझको
कोई न मुड़के देखे
तब पथ के काँटों को अपने
रक्त सने चरणों के नीचे
दलो अकेले रे


गर ना हो आलोक कहीं भी
सुन ओ अरे अभागे
यदि अंधियारी रातों में
झंझावत का यम जागे
दरवाज़े हों बंद, जले वज्रानल तब तुम
अपना सीना-पंजर बालो
जलो अकेले रे!



           -रवींद्रनाथ टैगोर