अनछुआ शिकवा
जो इश्क़ करते हैं दिल से सच्चा वो दर्द सह कर भी मुस्कुराएँ,
तुम्हारी चाहत का रंग बताता, तुम्हारा वादा टूटा हुआ है।
लपेटा उँगलियों पे तुमने जो वो दुपट्टा कुछ शरमाकर,
तुम्हारी बेवफ़ाई का हर इक शिकवा अब छूटा हुआ है।
सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से,
मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।
अदाओं की नर्मी में ठहराव होता है असल शजर का,
तुम्हारे लहजे से साफ़ ये लगता सलीक़ा छूटा हुआ है।
ज़रा सी धूप क्या पाई कि तुम सर फ़ख़्र से ऊँचा उठाकर,
ग़ुरूर इतना भी मत पालो—अभी तजुर्बा छूटा हुआ है।
भले ही दुनिया बदल गई हो, मगर ‘विवेक’ अपनी धुन में,
वफ़ा का दामन थामे हुए—ये दिल अभी भी जुड़ा हुआ है।
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