Friday, April 10, 2026

 रौनक़-ए-काज़िब (झूठी चमक)

थी गवाही मुस्तैद दुनिया की हर इक तहरीर में,

अपनी रूह की वकालत करना भूल गए हम।


पूछता है आईना देख कर ये रौनक़-ए-काज़िब,

किसका नूर चेहरे पे सजाना भूल गए हम।


नींद की किश्तें चुका कर शहर को आबाद किया,

मसनदें क्या मिलीं कि ख़्वाब बुनना भूल गए हम।


किरदार की खुशबू को ढूँढो न इस मिट्टी में,

जिस्म है उधार, ये समझना भूल गए हम।


किराए की हँसी चेहरे पे पहने रहे उम्र भर,

आँख क्या छलकी कि मुस्कुराना भूल गए हम।


बेच डाली मुस्कुराहट इक खिलौने के लिए,

ख़ुद अपनी हँसी से आँख मिलाना भूल गए हम।


वक़्त ने 'साहब' वसूला है महसूल हर मोड़ पर,

ज़िंदगी जीत कर भी क्या जीतना भूल गए हम।

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर | लेखन जारी रहे |

Vivek Jain said...

धन्यवाद

Vivek Jain said...

धन्यवाद