बहुत लड़े हम अबकी बार
जीवन की गहमा गहमी में आते रहे
उतार चढ़ाव
किसने देखे किसने जाने
इस दुनिया के ताने बाने
कितनी बातें कितनी शर्तें
तर्कों पर तर्कों की पर्तें
बूत गए हम दोनो तो हैं एक नाव की
दो पतवार
लंबी बहसों का हलदायक
लड़ना अपनों का परिचायक
सच्चे मन से बहने वाले
आँसू होते हैं फलदायक
कड़वी दवा हमें देती है कभी कभी
असली उपचार
चलो काम को कल पर टालें
कुछ पल तो हम साथ बितालें
साथ बुने जो सपने मिल कर
आओ उनको पुनः संभालें
हाथ मिलाकर आज सजालें अपने सुख
का पारावार
-पूर्णिमा वर्मन
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Sunday, December 18, 2011
अबकी बार
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Friday, November 18, 2011
परिचय की वो गाँठ
यों ही कुछ
मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गाँठ लगा दी!
था पथ पर मैं
भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन
लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
कभी-कभी
यों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
जड़ता है
जीवन की पीड़ा
निष् तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने
अनजाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
-त्रिलोचन
मुस्काकर तुमने
परिचय की वो गाँठ लगा दी!
था पथ पर मैं
भूला भूला
फूल उपेक्षित कोई फूला
जाने कौन
लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
कभी-कभी
यों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है
तुमने वही धार उमगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
जड़ता है
जीवन की पीड़ा
निष् तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने
अनजाने वह पीड़ा
छवि के शर से दूर भगा दी।
परिचय की
वो गाँठ लगा दी!
-त्रिलोचन
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Tuesday, April 5, 2011
महारथी
झूठ आज से नहीं
अनन्त काल से
रथ पर सवार है
और सच चल रहा है
पाँव-पाँव
नदी पहाड़ काँटे और फूल
और धूल
और ऊबड़-खाबड़ रास्ते
सब सच ने जाने हैं
झूठ तो
समान एक आसमान में उड़ता है
और उतर जाता है
जहाँ चाहता है
क्रमश: बदली है
झूठ ने सवारियाँ
आज तो वह सुपरसॉनिक पर है
और सच आज भी
पाँव-पाँव चल रहा है
इतना ही हो सकता है किसी-दिन
कि देखें हम
सच सुस्ता रहा है
थोड़ी देर छाँव में
और
सुपरसॉनिक किसी झँझट में पड़कर
जल रहा है
-भवानी प्रसाद मिश्र
अनन्त काल से
रथ पर सवार है
और सच चल रहा है
पाँव-पाँव
नदी पहाड़ काँटे और फूल
और धूल
और ऊबड़-खाबड़ रास्ते
सब सच ने जाने हैं
झूठ तो
समान एक आसमान में उड़ता है
और उतर जाता है
जहाँ चाहता है
क्रमश: बदली है
झूठ ने सवारियाँ
आज तो वह सुपरसॉनिक पर है
और सच आज भी
पाँव-पाँव चल रहा है
इतना ही हो सकता है किसी-दिन
कि देखें हम
सच सुस्ता रहा है
थोड़ी देर छाँव में
और
सुपरसॉनिक किसी झँझट में पड़कर
जल रहा है
-भवानी प्रसाद मिश्र
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