Thursday, May 14, 2026

 अनछुआ शिकवा

जो इश्क़ करते हैं दिल से सच्चा वो दर्द सह कर भी मुस्कुराएँ, 

तुम्हारी चाहत का रंग बताता, तुम्हारा वादा टूटा हुआ है।

 

लपेटा उँगलियों पे तुमने जो वो दुपट्टा कुछ शरमाकर, 

तुम्हारी बेवफ़ाई का हर इक शिकवा अब छूटा हुआ है।

 

सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से, 

मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।

 

अदाओं की नर्मी में ठहराव होता है असल शजर का, 

तुम्हारे लहजे से साफ़ ये लगता सलीक़ा छूटा हुआ है।

 

ज़रा सी धूप क्या पाई कि तुम सर फ़ख़्र से ऊँचा उठाकर, 

ग़ुरूर इतना भी मत पालो—अभी तजुर्बा छूटा हुआ है।

 

भले ही दुनिया बदल गई हो, मगर ‘विवेक’ अपनी धुन में, 

वफ़ा का दामन थामे हुए—ये दिल अभी भी जुड़ा हुआ है।

3 comments:

Priyahindivibe | Priyanka Pal said...

सुंदर

Anonymous said...

Thanks

Sweta sinha said...

बहुत सुंदर रचना।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।