Sunday, June 20, 2010

वे किसान की नयी बहू की आँखें

नहीं जानती जो अपने को खिली हुई--
विश्व-विभव से मिली हुई,--
नहीं जानती सम्राज्ञी अपने को,--
नहीं कर सकीं सत्य कभी सपने को,
वे किसान की नयी बहू की आँखें
ज्यों हरीतिमा में बैठे दो विहग बन्द कर पाँखें;
वे केवल निर्जन के दिशाकाश की,
प्रियतम के प्राणों के पास-हास की,
भीरु पकड़ जाने को हैं दुनियाँ के कर से--
बढ़े क्यों न वह पुलकित हो कैसे भी वर से।
-सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

4 comments:

Divya said...

wonderful creation !

उपदेश सक्सेना said...

निराला जी की कृतियाँ वास्तव में निराले ढंग से मान को हिलाने और प्राकृतिक-सामाजिक परिवेश को साक्षात् उपस्थित करने वाली हैं. बहुत बढ़िया प्रस्तुति.

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

niraala ji ki ye kavita maine bahut pahle kahin padhi thi... yaad taaja karne k liye dhanyavaad...

Vivek Jain said...

thanks friends for your comments