Friday, June 10, 2011

बूँद टपकी नभ से


बूँद टपकी एक नभ से
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो
हँस रही-सी आँख ने जैसे
किसी को कस दिया हो
ठगा-सा कोई किसी की
आँख देखे रह गया हो
उस बहुत से रूप को
रोमांच रोके सह गया हो।

बूँद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
अभ्र थोड़ा हट गया था।

बूँद टपकी एक नभ से
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बंद हो ले
और नूपुर ध्वनि झमक कर
जिस तरह द्रुत छंद हो ले
उस तरह
बादल सिमट कर
और पानी के हज़ारों बूँद
तब आएँ अचानक।
- भवानी प्रसाद मिश्र

40 comments:

Maheshwari kaneri said...

बूँद टपकी एक नभ से
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो
हँस रही-सी आँख ने जैसे
किसी को कस दिया हो
ठगा-सा कोई किसी की
आँख देखे रह गया हो
उस बहुत से रूप को
रोमांच रोके सह गया हो।
ह्र्दय से निकली सुन्दर अभिव्यक्ति्…..….

राकेश कौशिक said...

कविवर भवानी प्रसाद मिश्र जी की रचना "बूँद टपकी नभ से" पढवाने के लिए धन्यवाद्

Vaanbhatt said...

भवानी प्रसाद जी की रचना प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद...

रश्मि प्रभा... said...

बूँद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
अभ्र थोड़ा हट गया था। ... achhi rachna padhne ko mili

अभिषेक मिश्र said...

समयानुकूल रचना. आभार.

veerubhai said...

बुनी हुई रस्सी के प्रणेता को सुनवा आज आपने निहाल किया .आभार ।
सब का अपना पाथेय पंथ एकाकी है ,
अब होश हुआ जब इने गिने दिन बाकी हैं .

शालिनी कौशिक said...

बूँद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
bhavani prasad ji kee sundar kavita aur aapki sarthak prastuti.badhai.

ज्योति सिंह said...

बूँद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
अभ्र थोड़ा हट गया था।
bahut hi khoobsurat rachna .aapki tippani padhkar hans padi ,aabhari hoon ,

anupama's sukrity ! said...

Bhavani prasad ji ki sunder rachna padhvane ke liye abhar .

Rachana said...

बूँद टपकी एक नभ से
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बंद हो ले
और नूपुर ध्वनि झमक कर
जिस तरह द्रुत छंद हो ले
उस तरह
बादल सिमट कर
और पानी के हज़ारों बूँद
तब आएँ अचानक।
bahut sunder kavita
saader
rachana

vandana said...

ठगा-सा कोई किसी की
आँख देखे रह गया हो
उस बहुत से रूप को
रोमांच रोके सह गया हो।.....
आपके ब्लॉग पर कुछ ऐसी भी रचनाएं भी पढ़ने को मिल जायेंगी जहाँ तक पाठक पहुंचा न हो ..अच्छा संकलन आभार

Sadhana Vaid said...

इतनी कोमल एवं भावपूर्ण रचना पढवाने के लिये धन्यवाद !

ZEAL said...

सुन्दर अभिव्यक्ति् !!

संतोष त्रिवेदी said...

भवानी प्रसाद जी को पढ़ना वाकई सुखद है,साभार !

Babli said...

बूँद टपकी एक नभ से
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बंद हो ले...
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! उम्दा रचना!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

Behad sunder rachna padhwai.....Dhanywad

निर्मला कपिला said...

भवानी प्रसाद जी की भावनायें बरसाती बूँदों सी झर कर असीम आनन्द मे सराबोर कर गयी। गहरी भावनाओं की अभिव्यक्ति सुन्दर शब्दों मे। शुभकामनायें।

Ravikar said...

oh!
कितना अंतर है, इन स्तरीय रचनाओं
और हमारी सतही रचनाओं में,

रोमांच के बाद अक्सर
अवसाद का शिकार हो जाता हूँ ||

दिगम्बर नासवा said...

Bahut hi lajawab .. shukriya is rachna ke liye ...

Kailash C Sharma said...

शुक्रिया इतनी सुन्दर रचना पढवाने के लिये...आभार

एम सिंह said...

मिश्र जी की रचना पढ़वाने के लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद.

एम सिंह

संजय भास्कर said...

....सुन्दर रचना पढवाने के लिये...आभार

G.N.SHAW said...

भवानी प्रसाद जी ने एक बूंद की गरीमा प्रस्तुत की है , पर आज - कल बूंद को कौन पूछता है ..सभी झुण्ड के आगे नतमस्तक है ! भवानी प्रसाद जी बधाई के योग्य है !

Patali-The-Village said...

सुन्दर रचना पढवाने के लिये धन्‍यवाद|

नीरज गोस्वामी said...

आहा...आनंद...वाह...बेजोड़ कविता.

गुनगुनाती हुई गिरती हैं फलक से बूँदें
कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है

नीरज

प्रवीण पाण्डेय said...

अनुपम कृति, पढ़वाने का आभार।

rashmi ravija said...

बूँद टपकी एक नभ से
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो
हँस रही-सी आँख ने जैसे

इतनी प्यारी सी रचना पढवाने का बहुत बहुत शुक्रिया

rashmi ravija said...
This comment has been removed by the author.
***Punam*** said...

बूँद टपकी एक नभ से
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बंद हो ले
और नूपुर ध्वनि झमक कर
जिस तरह द्रुत छंद हो ले

इस बारिश से मन भीग गया...
बहुत सुन्दर...

डॉ० डंडा लखनवी said...

विवेक जैन जी!
मिश्र जी के सामने एक सपना था-स्वराज्य का सपना। जिसकी आशा और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में मिलती है। तब छायावाद और रहस्यवाद के आभामंडल तले रचनाएं संस्कृत-निष्ठ, परिष्कृत और छंदानुशासन में निबद्ध हुआ करती थीं। उस युग में अभिव्यक्ति का स्वर इतना तीखा न था। आज उदारीकरण और उदरीकरण का वेग है। इस दौर में बहुत तेजी से मूल्यों का क्षरण हुआ हैं। आप जो रचना-श्रंखला जोड़ रहे हैं। उससे तब और अब के परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी। इस अभियान को जारी रखिए। इस प्रयास के लिए बधाई।

BrijmohanShrivastava said...

भवानी दादा की तो बात ही अलग । धन्यवाद उनकी रचना पढवाने को

mahendra verma said...

बूँद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
अभ्र थोड़ा हट गया था।

बहुत सुंदर कविता प्रस्तुत करने के लिए आभार।

Jyoti Mishra said...

What shall I say
Its simply stunning !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

भवानी जी की इस कालजयी रचना को हम तक पहुंचाने का शुक्रिया।

---------
हॉट मॉडल केली ब्रुक...
लूट कर ले जाएगी मेरे पसीने का मज़ा।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

भवानी जी की इस कालजयी रचना को हम तक पहुंचाने का शुक्रिया।

---------
हॉट मॉडल केली ब्रुक...
लूट कर ले जाएगी मेरे पसीने का मज़ा।

Vivek Jain said...

आप सभी का हार्दिक धन्यवाद
-विवेक जैन

Udan Tashtari said...

बहुत आभार...तलाश थी इस रचना की..

यशवन्त माथुर said...


दिनांक 06/01/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

“दर्द की तुकबंदी...हलचल का रविवार विशेषांक....रचनाकार...रविकर जी”

Reena Maurya said...

अति सुन्दर रचना..
:-)

prritiy----sneh said...

bahut pyari rachna
shubhkamnayen