Monday, June 20, 2011

गरमी में प्रात:काल

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।


जब मन में लाखों बार गया-
आया सुख सपनों का मेला,
जब मैंने घोर प्रतीक्षा के
युग का पल-पल जल-जल झेला,
मिलने के उन दो यामों ने
दिखलाई अपनी परछाईं,
वह दिन ही था बस दिन मुझको
वह बेला थी मुझको बेला;
उड़ती छाया सी वे घड़ि‍याँ
बीतीं कब की लेकिन तब से,
गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

तुमने जिन सुमनों से उस दिन
केशों का रूप सजाया था,
उनका सौरभ तुमसे पहले
मुझसे मिलने को आया था,
बह गंध गई गठबंध करा
तुमसे, उन चंचल घ‍ड़ि‍यों से,
उस सुख से जो उस दिन मेरे
प्राणों के बीच समाया था;
वह गंध उठा जब करती है
दिल बैठ न जाने जाता क्‍यों;
गरमी में प्रात:काल पवन,
प्रिय, ठंडी आहें भरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

चितवन जिस ओर गई उसने
मृदों फूलों की वर्षा कर दी,
मादक मुसकानों ने मेरी
गोदी पंखुरियों से भर दी
हाथों में हाथ लिए, आए
अंजली में पुष्‍पों से गुच्‍छे,
जब तुमने मेरी अधरों पर
अधरों की कोमलता धर दी,
कुसुमायुध का शर ही मानो
मेरे अंतर में पैठ गया!
गरमी में प्रात:काल पवन
कलियों को चूम सिहरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।


गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

-हरिवंशराय बच्चन

21 comments:

arvind said...

गरमी में प्रात:काल पवन,
प्रिय, ठंडी आहें भरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है। ...aabhaar

रविकर said...

ये पवन और बेला
क्या है झमेला ?
या कोई नया खेला --
ओह सारी--
व्यर्थ ही फेंका ढेला ||

अरे !
ये तो बिग बी के बाबू जी की रचना है ||
व्यर्थ की टीका-टिप्पणी से बचना है ||
चुपचाप गंभीरता से लेना है पढ़ --
छुपा सन्देश खोजना है, समझना है ||

रविकर said...

पवन बेला सपना
प्रतीक्षा छाया ||
सुमन रूप सौरभ
चंचल प्रिय वर्षा ||
मुसकान अंजली
पुष्पा कोमल
करे हमारा जीवन
उज्जवल ||

Maheshwari kaneri said...

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।
बच्चन जी की ये सुन्दर कविता है...आभार

Pavan Gurjar said...

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।
यू तो गर्मी से परेशान हम ,पर खुशबू तुम्हारे गजरे की जब हमरे सांसे महका जाती है ...मानो जिंदगी की हर ख़ुशी मिल जाती है ......आभार ..

daanish said...

साहित्य की अनमोल धरोहर प्रस्तुत
करने के लिए आभार स्वीकारें .

सुबीर रावत said...

जब मन में लाखों बार गया-
आया सुख सपनों का मेला,
जब मैंने घोर प्रतीक्षा के
युग का पल-पल जल-जल झेला,
Nice one. Thanx Vivek ji.

prerna argal said...

चितवन जिस ओर गई उसने
मृदों फूलों की वर्षा कर दी,
मादक मुसकानों ने मेरी
गोदी पंखुरियों से भर दी
हाथों में हाथ लिए, आए
अंजली में पुष्‍पों से गुच्‍छे,
जब तुमने मेरी अधरों पर
अधरों की कोमलता धर दी,
कुसुमायुध का शर ही मानो
मेरे अंतर में पैठ गया!
गरमी में प्रात:काल पवन
कलियों को चूम सिहरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।
bahut sunder shabdon main likhi behatrin rachanaa badhaai,

Vaanbhatt said...

बच्चन जी की रचनायें उन्हीं की तरह सहज हुआ करती हैं...

शालिनी कौशिक said...

bachchan ji kee ye kavita yahan prastut karne ke liye aabhar.

प्रवीण पाण्डेय said...

रिमझिम शब्दों का गीत पढ़वाने का आभार।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बीहड़ पथ पर चलते जाना
बस इतनी ही मंजिल है
मंजिल यदि चाहूं पाना
वह उतनी ही मुश्किल है
--
आपने बच्चन जी की सुन्दर रचना प्रस्तुत की है!

shikha varshney said...

मेरे पसंदीदा कवि की यह रचना यहाँ पढवाने का शुक्रिया.

विशाल said...

thanks for sharing.

veerubhai said...

गर्मी में प्रातः काल पवन ,बेला से खेला करता जब ,
तब याद तुम्हारी आती है -
यही सोच रहा था इतनी मादकता इतना नशा किस कवि में हो सकता है ,कवितांश पर पहुंचा जब तब जाना -
इस पार प्रिय मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा ,
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो ,
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा .
शुक्रिया विवेक जी ऐसी ही मिठास समेट ते रहो रसपान करवाते रहो .

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुहाने मौसम मे शब्दों की यह रिमझिम फुहार खुशी दूना कर देती है।

Bhushan said...

चितवन जिस ओर गई उसने
मृदों फूलों की वर्षा कर दी,

वाह इतनी सरस कविता देने के लिए शुक्रिया विवेक जी.

aarkay said...

मेरे प्रिय कवि बच्चन जी की एक और सुंदर रचना से परिचय करवाने के लिए आभार !

Babli said...

बच्चन जी की ये कविता बहुत अच्छी लगी! आभार!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

आशुतोष की कलम said...

अनश्वर अमर हैं भावनाप्रद यादें..
कविता की प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार

S.M.HABIB said...

आनंद आ गया पढ़कर....
बच्चन जी की अपठित रचना से मुलाक़ात कराने के लिए बेहद आभार....