Thursday, November 3, 2011

और मैं लाचार पति निर्धन

काँटों में बिंधे हुए फूलों के हार-सी
लेटी है प्राण-प्रिया पत्नी बीमार-सी
और मैं लाचार पति, निर्धन ।
समय-पर्यंक
आयु-चादर अति अल्पकाय,
सिमटी-सी
समझाती जीने का अभिप्राय,
आह-वणिक
करता है साँसों का व्यवसाय
खुशियों के मौसम में घायल त्यौहार-सी
आशाएँ महलों की गिरती दीवार-सी
और मैं विमूढ़मति, आँगन।
ज्योतिलग्न लौटी
तम-पाहन से टकरायी
हृदय-कक्ष सूना,
हर पूजा भी घबरायी
मृत्युदान-याचक है,
जीवन यह विषपायी
भस्म-भरी कालिख़ में बुझते अंगार-सी
तस्वीरें मिटी हुईं टूटे श्रृंगार-सी
और मैं पतझर-गति, साजन ।
-कुँअर बेचैन

8 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अद्भुत उद्गार..

चंदन कुमार मिश्र said...

अजीब…बेचैन साहब माने गजल लिखनेवाले के ऐसे शब्दप्रयोग…

वन्दना said...

मार्मिक चित्रण्।

G.N.SHAW said...

सुन्दर , पर एक गमगीन सी ! बधाई इस प्रस्तुति के लिए !

दिगम्बर नासवा said...

अध्बुध शब्द संयोजन ... लाजवाब लिखा है कुंवर जी ने ..

Vaanbhatt said...

बेहद संवेदनशील...

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया प्रस्‍तुति ..

prerna argal said...

bahut hi sambedansheel aur gamgin karati hui anoothi rachanaa.bahut badhaai aapko.
मुझे ये बताते हुए बड़ी ख़ुशी हो रही है , की आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (१६)के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप हिंदी की सेवा इसी तरह करते रहें यही कामना है /आपका
ब्लोगर्स मीट वीकली के मंच पर स्वागत है /आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए / जरुर पधारें /