Tuesday, May 12, 2026

 

मंज़िल-निगाह

शजर हूँ सहन में, बेलों को यूँ छुपाये हूँ, 

वफ़ा की नींव पर संगमरमर उठाये हूँ।

 

धूप के ज़ेवरों से घर सदा जगमगाऊँ मैं, 

तपिश-ए-दहर से आँगन को बचाये हूँ।

 

किरन की ओट में रखकर मैं साया बुन रहा हूँ, 

नज़र से धूप की हर चाल को उलझाये हूँ।

 

हवाओं से भी रखता हूँ मैं रब्त एहतियात के, 

महकती याद को दिल में बसाये हूँ।

 

सुकूत-ए-शब में भी इक शोर सा पलता है भीतर, 

अना की आँच को मैं खुद ही बुझाये हूँ।

 

तूफ़ाँ को बाँध रक्खा है हदों की कैद में मैंने, 

साहिल पे आरज़ुओं के चराग़ जलाये हूँ।

 

मैं ख़ुद ही अपनी राह का मंज़िल-निगाह सदा, 

हर एक मोड़ पे दिल के निशाँ लगाये हूँ।

 

निगाह ने दर्द सींचा तो मआनी खिल गये हैं, 

हर एक ज़ख़्म से अफ़कार को उगाये हूँ।

 

ज़मीं से आसमाँ तक एक रेशा-ए-उम्मीद हूँ, 

गिरे जो ख़्वाब, तो पलकों पे फिर उठाये हूँ।

 

वजूद इक लम्हा-ए-आगाही के सिवा क्या है, 

गिरह जो खुल गई अपनी, तो ख़ुद को पाये हूँ।

 

गुमाँ था मैं जुदा हूँ, ये धोका था फ़क़त दिल का, 

उसी को ढूँढने निकला, उसी को पाये हूँ।

2 comments:

Priyahindivibe | Priyanka Pal said...

बहुत सुंदर

Anonymous said...

शुक्रिया