लगभग 20 मई 2026 की बात है, समाचार स्रोत 'टाइम्स ऑफ इंडिया' (TOI) के अनुसार—एक डिलीवरी एग्जीक्यूटिव (डिलिवरी कर्मी) एक ग्राहक के फ्लैट पर डिलीवरी पूरी करता है। तुरंत निकलने के बजाय, उसकी नज़र पास ही पड़े एक पुराने, फेंके हुए क्रिकेट बल्ले पर पड़ती है। वह कुछ पल के लिए रुकता है और खेल की यादों में खोकर, हवा में बल्ले से कुछ हल्के शॉट्स (स्ट्रोक्स) खेलने लगता है। वहाँ से जाने से पहले, वह बल्ले को चूमता है—एक शांत और गहरा भावुक कर देने वाला एहसास।
लम्हे भर का बचपन
कोई टूटा हुआ बल्ला भी मौसम बदल रहा है
किसी वीरान से लम्हे में जैसे कुछ मचल रहा है
वो दर पर ठहरकर जो इक लम्हा खेलता था
उसी लम्हे में शायद उम्र भर का पल रहा है
नज़र-अंदाज़ लम्हों की भी कैसी दास्ताँ ठहरी
जहाँ कुछ ख़ाक-सा था, अब वहीं दिल पिघल रहा है
न था सामान कुछ भी, बस ख़यालों की ही रौनक
वही सादा-सा मंज़र हर कमी को छल रहा है
किसी ने देख कर भी देखना सीखा नहीं अब तक
किसी का रुक के हँस देना मगर सब ढल रहा है
न थी आवाज़ ऊँची, न कोई दावा-ए-हिकमत
मगर ख़ामोशियों में वक़्त कुछ कहकर चल रहा है
अजब है ये तअल्लुक़—न तअलीम-ओ-तरबियत कोई
कोई मासूम-सा जज़्बा यूँ ही पल-पल फल रहा है