Monday, October 24, 2011

मेरे दीपक

मेरे दीपक

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल;
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन,
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल!
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

सारे शीतल कोमल नूतन, माँग रहे तुझसे ज्वाला-कण;
विश्वशलभ सिर धुन कहता मैं हाय न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक, स्नेहहीन नित कितने दीपक;
जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम, ज्वाला को करते हृदयंगम;
वसुधा के जड़ अंतर में भी, बंदी है तापों की हलचल!
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निश्वासों से दुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर,
मैं अँचल की ओट किए हूँ, अपनी मृदु पलकों से चंचल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बंधन, है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन,
मैं दृग के अक्षय कोशों से तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सजल-सजल मेरे दीपक जल!

तम असीम तेरा प्रकाश चिर, खेलेंगे नव खेल निरंतर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल!
सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल जल होता जितना क्षय, वह समीप आता छलनामय,
मधुर मिलन में मिट जाना तू उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!

-महादेवी वर्मा

9 comments:

कविता रावत said...

दीपावली के सुअवसर पर महादेवी जी की सुन्दर संदेशपरक रचना 'मेरे दीपक' की सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार..
दीप पर्व की आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनायें

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति |

शुभ-दीपावली ||

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, पढ़ने का रस आ गया।

अनुपमा पाठक said...

सीमा ही लघुता का बंधन, है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन,
मैं दृग के अक्षय कोशों से तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सजल-सजल मेरे दीपक जल!
सुन्दर!

Kailash C Sharma said...

महादेवी वर्मा जी की उत्कृष्ट रचना पढ़वाने के लिये आभार ..दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

संजय भास्कर said...

महादेवी जी की उत्कृष्ट रचना पढ़वाने के लिये आभार ..दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

चंदन कुमार मिश्र said...

दसवीं में पाठ्यपुस्तक में पढ़नी थी यह…आपने फिर यह याद दिलाया…

कुश्वंश said...

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

संगीता पुरी said...

अति सुंदर ..
.. दीपावली की शुभकामनाएं !!