Wednesday, July 6, 2011

कलम, आज उनकी जय बोल

जो अगणित लघु दीप हमारे
तुफानों में एक किनारे
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल
- रामधारी सिंह दिनकर

14 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

ललकारती, कलमों को।

प्रतुल वशिष्ठ said...

कलम, आज उनकी जय बोल

@
कलम मौन रहती है मेरी.
उसके पद पर आ बैठे हैं
की-बोर्ड के अंगुलि-चेरी.

Voice of youths said...

राष्ट्र कवि की कविता का तो हर कोई दीवाना है भाई, धन्यवाद आपको

Vaanbhatt said...

दिनकर जी अपनी बात बहुत सशक्त तरीके से कहते थे...

सुबीर रावत said...

राष्ट्रकवि की साधारण शब्दों में एक सुन्दर कविता.
सार्थक व रचनात्मक पोस्ट के लिए आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

S.M.HABIB said...

द्निनकर जी को सादर नमन.....

रविकर said...

बहुत सुन्दर ||
बधाई ||

संतोष त्रिवेदी said...

nice work by dinkar !

Arunesh c dave said...

कलम, आज उनकी जय बोल

veerubhai said...

ललकार भरी जोश पूर्ण रचना -
कुरुक्षेत्र की फिर याद आई .

रेखा said...

दिनकर जी मेरे पसंदीदा कवियों मैं से एक हैं उनकी रचना पढ़वाने के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद

अनामिका की सदायें ...... said...

kaisa ittifak hai na ki aapki post aur meri post ka sheershak ek sa hai aur vo bhi ek hi din post kiya jana.

prabhahi abhivyakti.

Vivek Jain said...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी का बहुत बहुत आभारी हूँ, साथ ही आप का भी बहुत बहुत धन्यवाद,
विवेक जैन