Thursday, July 14, 2011

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दायर में

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
-ज़फ़र

22 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह।

Kailash C Sharma said...

लाज़वाब गज़ल पढवाने के लिये आभार..

रविकर said...

बहुत बढ़िया गजल |
भाई गजल ही है न |
नज्म किसे कहते हैं --
बताना कोई ||

रविकर said...

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

Vishaal Charchchit said...

विवेक जी! हेडिंग में 'दायर' हो गया है, सुधार लीजिये बाकी रचना तो निर्विवाद रूप से बेजोड़ है ही...

रेखा said...

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

जफ़र का मातृभूमि के प्रति प्रेम उजागर करता शेर

सुबीर रावत said...

बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
जफ़र साहब की यह ग़ज़ल बेशक बहुत उम्दा है. आभार आपका.

रश्मि प्रभा... said...

waah...

Rajesh Kumari said...

Jafar ji ki sunder ghazal padhvaane ke liye bahut aabhar.

संजय भास्कर said...

जफ़र साहब की बहुत उम्दा ग़ज़ल है..... आभार

संजय भास्कर said...

अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

Jyoti Mishra said...

waah waah... aanand aa gaya

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

बहुत सुंदर।

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जीवन का सूत्र...
लोग चमत्‍कारों पर विश्‍वास क्‍यों करते हैं?

Vaanbhatt said...

ज़फर का दर्द बयां करती ग़ज़ल...

veerubhai said...

शहीद और शायर आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र साहब की यह नज्म हबीब पेंटर की आवाज़ में बचपन से सुनते आयें हैं .रफ़ी साहब की आवाज़ में भी सुनी .क्या ज़ज्बा इन लोगों में .दिल की बात कहते थे दिल से .कृपया मुश्किल लफ़्ज़ों के मायने लिख दें विवेक जी .

Vivek Jain said...

वीरूभाई साहब, आगे से ध्यान रखूंगा और शब्दार्थ भी देने की कोशिश करुंगा, आपके सुझाव का धन्यवाद,
विवेक जैन

Mrs. Asha Joglekar said...

सुंदर सुंदर कविताएँ पढवा रहा है आपका ये बलॉग । बहादुर शाह जफर की ये गज़ल तो नायाब है ।
दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में ।
कुंजे है कि कूचा-ए है यदि कुंजे है तो इसका अर्थ भी बता दें वैसे ही, लालाज़ार का मतलब भी नही मालूम ।

जयकृष्ण राय तुषार said...

भाई बहुत ही सुन्दर गजल बधाई जफर साहब को पढ़ना मुझे भी अच्छा लगता है |

Bhushan said...

यह ग़ज़ल सैंकड़ों बार सुनी है परंतु आज भी ताज़ातरीन लगती है.

DR.NAVEEN KUMAR SOLANKI.... said...

vivek ji.....waakayi me shaandaar........one of my fav gazhal..........bahaadur shah jafar saahab ne b kya khub likhi hai........:)


regards
naveen solanki

aarkay said...

ग़ज़ल के कुछ नए बंद प्रस्तुत करने के लिए आभार !

Priyankaabhilaashi said...

ज़फर साहब..क्या खूब लिख गए..!!!! उम्दा..!!!! बेहतरीन..!!!


शुक्रिया..ग़ज़ल पढने का मौका मिला..!!!