Tuesday, July 26, 2011

कहानी कहते कहते

मुझे कहानी कहते कहते -
माँ तुम क्यों सो गईं?
जिसकी कथा कही क्या उसके
सपने में खो गईं?

मैं भरता ही रहा हुंकारा, पर तुम मूक हो गईं सहसा
जाग उठा है भाव हृदय में, किसी अजाने भय विस्मय-सा
मन में अदभत उत्कंठा का -
बीज न क्यों बो गईं?
माँ तुम क्यों सो गईं?

बीते दिन का स्वप्न तुम्हारा, किस भविष्य की बना पहेली
रही अबूझी बात बुद्धि को रातों जाग कल्पना खेली
फिर आईं या नहीं सात -
बहनें बन में जो गईं?
माँ तुम क्यों सो गईं?

पीले रंग के जादूगर ने कैसी काली वेणु बजाई
बेर बीनती सतबहना को फिर न कहीं कुछ दिया दिखाई
क्यों उनकी आँखें, ज्यों मेरी -
गगनलीन हो गईं?
माँ तुम क्यों सो गईं?

फिर क्या हुआ सोचता हूँ मैं, क्या अविदित वह शेष कथा है
जीव जगे भव माता सोए, मन में कुछ अशेष व्यथा है
बेध सुई से प्रश्न फूल मन -
माला में पो गईं!
माँ तुम क्यों सो गईं?
-पं. नरेन्द्र शर्मा

17 comments:

Gopal Mishra said...

भावुक करती कविता. आपका कविताओं का संग्रह काफी अच्छा है. धन्यवाद.

Babli said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय said...

स्वपन-कल्पना का विस्तृत विश्व।

kumar said...

aap jab bhi kuchh late hain

khubsurat hi hota hai....

Amrita Tanmay said...

बढ़िया लिखा है शर्मा जी ने .खुबसूरत कविता .शुभकामनायें

vidhya said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता!

रेखा said...

बहुत सुन्दर रचना

Apanatva said...

aapto bachapan louta lae saree yade taza ho aaee hai...

suner prastuti.

सुबीर रावत said...

भावनाप्रधान गीत. गीत में गत्यात्मकता इतनी कि पाठक खो कर रह जाता है. ..... एक सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार !

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-.....

वीना said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना....
बहुत प्यारी...

दिगम्बर नासवा said...

भाव पूर्ण ... गहरे तक जाती है ये संवेदनशील रचना ...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

मन को छू जाने वाले भाव।

.......
प्रेम एक दलदल है..
’चोंच में आकाश’ समा लेने की जिद।

S.M.HABIB said...

बहुत भावपूर्ण कविता प्रस्तुत की है आपने...
सादर..

कविता रावत said...

फिर क्या हुआ सोचता हूँ मैं, क्या अविदित वह शेष कथा है
जीव जगे भव माता सोए, मन में कुछ अशेष व्यथा है
बेध सुई से प्रश्न फूल मन -
माला में पो गईं!
माँ तुम क्यों सो गईं?
.....gahan bhav mein piroyee sundar mamtamayee prastuti...

sm said...

माँ तुम क्यों सो गईं?
beautiful touching poem

Vaanbhatt said...

पं. नरेन्द्र शर्मा को पढवाने का शुक्रिया...