Monday, July 18, 2011

लीक पर वे चलें जिनके..

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

25 comments:

रविकर said...

दयाल साहब की
सुन्दर प्रेरक कृति ||

prerna argal said...

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
bahut sunder prastuti.badhaai aapko.



please visit my blog.thanks.

aarkay said...

लीक पर न चल कर अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करने की प्रेरणा देती इस सुंदर रचना को प्रस्तुत करने के लिए आभार !

vidhya said...

आप का बलाँग मूझे पढ कर अच्छा लगा , मैं भी एक बलाँग खोली हू
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

Maheshwari kaneri said...

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं ...मन भावन प्रस्तुति...

Udan Tashtari said...

आभार पढ़वाने का.

रेखा said...

सक्सेनाजी की रचना पढ़वाने के लिए आभार

अविनाश मिश्र said...

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।
सक्सेना jee ki behad sundar rachna....
bahut bahut dhanywad....

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;

prakit ko sajiv banakar badi hi khubsurti se bayan kiya..dil se kah raha hooon bahu acchi rachna hai..tad ke ped to roj dekhta hoon per itni khusurti se aisa na socha tha

Vishaal Charchchit said...

बचपन में पढ़ी सर्वेश्वर जी की इस कविता को ताज़ा करने लिए दिल से धन्यवाद विवेक जी.....

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aapse bida lete lete hi rukna pad gaya..aapne to meri sochi hui koi murad hi puri kar di...itna badhiya collection kiya hai..ek se badhkar ek ustad ki rachnayein..punah dil se hardik dhanyawad

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आभार!

प्रवीण पाण्डेय said...

अनिर्मित पंथ हमें भी प्यारे हैं।

सुबीर रावत said...

""....हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं.....""
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक सुन्दर रचना. आभार !
विवेक जी, अगर आप अन्यथा न लें तो कहूँगा कि स्वर्ग सिधार चुके कवि अपनी रचनाओं को नेट पर देखकर निश्चित रूप से आप पर फूलों की वर्षा अवश्य करते होंगे, बिल्कुल उसी अंदाज में जैसे हमारे धार्मिक फिल्मों और टीवी सीरियलों में होती है.

Kailash C Sharma said...

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

...बहुत सुन्दर और प्रेरक प्रस्तुति...पढवाने के लिये आभार

शिखा कौशिक said...

लीक से हटकर कार्य करने वाले ही इस जगत को कुछ नया दे पाते हैं .बहुत सार्थक कविता प्रस्तुत की है आपने सर्वेश्वर जी की .आभार

Vaanbhatt said...

प्रगतिवादी कवि की निशानी है...अपनी ताकत पर भरोसा...

Daanish said...

Thanks for visiting :)

Priyankaabhilaashi said...

शुक्रिया इतनी सुंदर कविता से रूबरू होने का मौका मिला..!!!

Vivek Jain said...

बहुत बहुत आभार आपका हौसला बढ़ाने के लिये,

-विवेक जैन

sm said...

nice poem

vandana said...

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं
आपके ब्लॉग के लिये शुभकामनाएं

chirag said...

kya bat hain

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

बहुत सुंदर रचना। सचमुच क्रिएटिव लोग लीक पर नहीं चलते।

------
बेहतर लेखन की ‘अनवरत’ प्रस्‍तुति।
अब आप अल्‍पना वर्मा से विज्ञान समाचार सुनिए..

Dr Varsha Singh said...

नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह सुन्दर रचना पहले भी पढ़ चुकी हूं...आपके सौजन्य से पुनः पढ़ ने का अवसर मिला...आभार.