Wednesday, September 7, 2011

शोले ही सही आग लगाने के लिये आ

शोले ही सही आग लगाने के लिये आ
फिर तूर के मंज़र को दिखाने के लिये आ

ये किस ने कहा है मेरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिये आ

ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा
तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ

दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म मुहब्बत की मिटाने के लिये आ

मतलब तेरी आमद से है दरमाँ से नहीं
"हसरत" की क़सम दिल ही दुखाने के लिये आ

-हसरत जयपुरी

8 comments:

vandana said...

achchhi rachna share kii aapne
ये किस ने कहा है मेरी तक़दीर बना दे
आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिये आ

Vaanbhatt said...

कहीं ये रंजिश ही सही तो नहीं...बहुत खूब...

रविकर said...

तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ ||

आपकी संकलन क्षमता और
स्वाद को प्रणाम ||

रेखा said...

वाह ...बहुत खूब

kumar said...

ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा
तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिये आ

उफ़....

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन पंक्तियाँ।

Saru Singhal said...

Bahut sundar...

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.....