Wednesday, September 14, 2011

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है फिर क्‍यों है यह प्‍यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूंकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है,हमारा भी
रक्‍त में जलती ईच्‍छाओं और आंखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्‍कर क्‍योंकर ?

दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है;
वसंत की मीठी हवाएं उसके लिए हैं;
फूल, पंक्षियों का कलरव सबकुछ
उसके लिए है
पर प्‍यार आता है
अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता

फिर भी न जाने क्‍यों हमें
अस्तित्‍व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

9 comments:

Saru Singhal said...

Kya khaayal hai! Bahut Khoob!

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर भावानुवाद।

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

रेखा said...

वाह ..टैगोरजी की रचना पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार

Dr (Miss) Sharad Singh said...

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना की बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

Maheshwari kaneri said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

दिगम्बर नासवा said...

प्रेम का गहरा विश्लेषण करती रविन्द्रनाथ ठाकुर की ये कालजयी रचना बेमिसाल है ... शुक्रिया बहुत बहुत ...

प्रतीक माहेश्वरी said...

बेजोड़! रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नमन!

vandana said...

फिर भी न जाने क्‍यों हमें
अस्तित्‍व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है