Saturday, March 7, 2026

 रूह के धागे

मेरे हाथों में न कोई जादुई चिराग़ है,

न मेरे पास सदियों का कोई ख़ज़ाना है,

मैंने तो बस अपनी रूह के धागों से,

तुम्हारी ख़ातिर एक मख़मली साया सजाया है।

गर मेरे बस में वक़्त की रेशमी डोर होती,

तो मैं गुज़रे हुए लम्हों से तुम्हारा लिबास बुनता,

सावन की पहली बूंद को तुम्हारी अंगूठी बनाता,

और धूप की सुनहरी किरणों से तुम्हारा अक्स संवारता।

अगर मेरे बस में ये बादलों की स़फेद रुई होती,

तो मैं इससे तुम्हारे लिए एक नरम सी ज़मीन ढालता,

चुनता समंदर की लहरों से संगीत के कुछ क़तरे,

और तुम्हारे रास्ते में ख़ामोश ख़ुशबू सी बिछाता।

मगर मेरे पास तो बस मेरी ये पहली लरज़िश है,

जिसे मैंने अपनी हर दुआ की पहली महक बनाया है,

यही मेरा कुल सरमाया, यही मेरी ज़मीन है,

इन्हें बिछा दिया है मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए।

ज़रा नज़ाकत से कदम रखना इन रास्तों पर तुम,

क्योंकि ये मेरे वजूद की मख़मली सरहदें हैं,

जैसे किसी ओस की बूंद में ठहरी हुई कोई सांस हो,

ज़रा सी ठेस लगी तो जो मिट जाने वाली तस्वीर हैं।

पैर रखना तो इस तरह कि आहट भी न हो,

क्योंकि तुमने मेरे तसव्वुर की सरहद छुई है,

तुम्हारे पैरों की आहट से ये धड़क उठते हैं,

कि इनमें बसी मेरी उम्र भर की इबादत है।