Showing posts with label मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे. Show all posts
Showing posts with label मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे. Show all posts

Sunday, July 10, 2011

मुझको भी तरकीब सिखा यार जुलाहे

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोइ तागा टुट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिराह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई

मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे
-ग़ुलज़ार